न्यायमूर्ति जीके व्यास को राजस्थान मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया
राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति जीके व्यास को शुक्रवार को राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया गया।
. अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ ही पूर्व IPS अधिकारी महेश गोयल को मानवाधिकार आयोग के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है।
• इन नियुक्तियों के साथ, आयोग की ताकत को पूर्ण कोरम मिला है। आयोग के एकमात्र सदस्य जस्टिस महेश चंद्र शर्मा आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं।
. नवंबर 2019 में जस्टिस प्रकाश टाटिया के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद आयोग के अध्यक्ष का पद खाली हो गया था। मुख्यमंत्री और विपक्षी नेता ने दूसरे दिन मुलाकात की और राज्यपाल को जस्टिस व्यास और महेश गोयल के नामों की सिफारिश भेजी।
• राज्य सरकार को मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की नियुक्तियों में देरी के कारण विभिन्न वैधानिक आयोगों की अनदेखी का सामना करना पड़ रहा था।
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• इन नियुक्तियों के साथ, आयोग की ताकत को पूर्ण कोरम मिला है। आयोग के एकमात्र सदस्य जस्टिस महेश चंद्र शर्मा आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं।
. नवंबर 2019 में जस्टिस प्रकाश टाटिया के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद आयोग के अध्यक्ष का पद खाली हो गया था। मुख्यमंत्री और विपक्षी नेता ने दूसरे दिन मुलाकात की और राज्यपाल को जस्टिस व्यास और महेश गोयल के नामों की सिफारिश भेजी।
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राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग
राजस्थान की राज्य सरकार ने दिनांक 18 जनवरी 1999 को एक अधिसूचना राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयेाग के गठन के संबंध में जारी की, जिसमें मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के प्रावधानुसार एक पूर्णकालिक अध्यक्ष एवं चार सदस्य रखे गये। अध्यक्ष एवं चार सदस्यों की नियुक्ति कर आयोग का गठन किया गया और मार्च, 2000 से यह आयोग क्रियाशील हो गया था।मानव अधिकार संरक्षण (संशोधित) अधिनियम, 2006 के अनुसार राज्य मानव अधिकार आयोग में एक अध्यक्ष और दो सदस्य का प्रावधान किया गया है।
राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयोग का मुख्य उद्देश्य राज्य में मानव अधिकारों की रक्षा हेतु एक निगरानी संस्था के रूप में कार्य करना है।
1993 के अधिनियम के अन्तर्गत धारा 2(घ) में मानव अधिकारों को परिभाषित किया गया है और इन न्यायोचित अधिकारों को भारतीय कानून के तहत अदालती आदेश द्वारा लागू कराया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर 10 दिसम्बर 1948 में मानव अधिकारों को परिभाषित कर सम्मिलित किया गया है और जिन्हे सख्ती से लागू किया जाना है।राज्य मानव अधिकार आयोग, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के अन्तर्गत एक स्वशाषी उच्चाधिकार प्राप्त मानव अधिकारों की निगरानी संस्था है। इसके स्वायतता हेतु आयोग के अध्यक्ष एवं नियुक्ति की प्रक्रिया इस प्रकार रखी गई है, जिससे उनके कार्य करने की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, साथ ही उनका कार्यकाल पूर्व में ही निश्चित कर दिया गया है और अधिनियम की धारा 23 के अन्तर्गत वैधानिक गारन्टी प्रदान की गई है और अधिनियम की धारा 33 के अन्तर्गत वित्तीय स्वायतता भी प्रदान की गई है।
आयोग का उच्च स्तर आयोग के अध्यक्ष, सदस्य एवं अधिकारीगण के स्तर से परिलक्षित होता है। अन्य आयोगों से भिन्न, आयोग के अध्यक्ष पद पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही नियुक्त किया जा सकता है और इसी प्रकार, आयोग सचिव राज्य सरकार के सचिव स्तर के अधिकारी से कम स्तर का अधिकारी नहीं हो सकता।
आयोग की अपनी एक अन्वेषण एजेन्सी है, जिसका नेतृत्व ऐसे पुलिस अधिकारी जो महानिरीक्षक पुलिस के पद से कम स्तर का नहीं हो, द्वारा किया जाता है।
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राजस्थान की राज्य सरकार ने दिनांक 18 जनवरी 1999 को एक अधिसूचना राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयेाग के गठन के संबंध में जारी की, जिसमें मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के प्रावधानुसार एक पूर्णकालिक अध्यक्ष एवं चार सदस्य रखे गये। अध्यक्ष एवं चार सदस्यों की नियुक्ति कर आयोग का गठन किया गया और मार्च, 2000 से यह आयोग क्रियाशील हो गया था।मानव अधिकार संरक्षण (संशोधित) अधिनियम, 2006 के अनुसार राज्य मानव अधिकार आयोग में एक अध्यक्ष और दो सदस्य का प्रावधान किया गया है।
राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयोग का मुख्य उद्देश्य राज्य में मानव अधिकारों की रक्षा हेतु एक निगरानी संस्था के रूप में कार्य करना है।
1993 के अधिनियम के अन्तर्गत धारा 2(घ) में मानव अधिकारों को परिभाषित किया गया है और इन न्यायोचित अधिकारों को भारतीय कानून के तहत अदालती आदेश द्वारा लागू कराया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर 10 दिसम्बर 1948 में मानव अधिकारों को परिभाषित कर सम्मिलित किया गया है और जिन्हे सख्ती से लागू किया जाना है।राज्य मानव अधिकार आयोग, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के अन्तर्गत एक स्वशाषी उच्चाधिकार प्राप्त मानव अधिकारों की निगरानी संस्था है। इसके स्वायतता हेतु आयोग के अध्यक्ष एवं नियुक्ति की प्रक्रिया इस प्रकार रखी गई है, जिससे उनके कार्य करने की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, साथ ही उनका कार्यकाल पूर्व में ही निश्चित कर दिया गया है और अधिनियम की धारा 23 के अन्तर्गत वैधानिक गारन्टी प्रदान की गई है और अधिनियम की धारा 33 के अन्तर्गत वित्तीय स्वायतता भी प्रदान की गई है।
आयोग का उच्च स्तर आयोग के अध्यक्ष, सदस्य एवं अधिकारीगण के स्तर से परिलक्षित होता है। अन्य आयोगों से भिन्न, आयोग के अध्यक्ष पद पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही नियुक्त किया जा सकता है और इसी प्रकार, आयोग सचिव राज्य सरकार के सचिव स्तर के अधिकारी से कम स्तर का अधिकारी नहीं हो सकता।
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भारत छोड़ो आंदोलन के समय इंग्लेंड का प्रधानमंत्री था?
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{RAS,SI, पटवार, वनपाल-वनरक्षक, रीट SSC }
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विजयपाल रोझ (इंस्पेक्टर राजस्थान पुलिस
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1857 की क्रांति के परिणाम ✍
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● 1857 ई. के विद्रोह के बाद ब्रिटिश संसद में भारत सरकार अधिनियम (2 अगस्त, 1858 ई. को पारित हुआ) के द्वारा कम्पनी का शासन समाप्त हो गया व भारत का शासन बिटिश क्राउन ब्रिटिश ताज ने अपने हाथों में ले लिया।
● 1 नवम्बर 1858 ई. को इलाहाबाद में दरबार आयोजित कर लार्ड केनिंग ने महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा को पढ़ा जिसे इलाहाबाद घोषणा पत्र के नाम से जाना जाता है।
● भारत में वायसराय का नया पद सृजित किया गया तथा भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन 1858 ई. में समाप्त किया।
● 1858 ई. में भारत सचिव का पद सृजित हुआ तथा प्रथम भारत सचिव चार्ल्स वुड को बनाया गया।
● 1858 ई. में लार्ड कैनिंग के द्वारा जोनाथन पील कमीशन गठित किया जिसने सेना में भारतीय सैनिकों का अनुपात कम कर दिया।
● 1857 के विद्रोह से पूर्व ब्रिटिश और भारतीय सेना का अनुपात 1:5 था, 1857 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी में भारतीय सैनिकों की कुल संख्या 2,38,000 थी। विद्रोह के पश्चात् बंगाल प्रेसिडेन्सी में यूरोपीय और भारतीय सैनिकों का अनुपात 1:2 तथा मद्रास और बम्बई प्रेसिडेन्सी में 1:3 का अनुपात रखा गया।
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● 1 नवम्बर 1858 ई. को इलाहाबाद में दरबार आयोजित कर लार्ड केनिंग ने महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा को पढ़ा जिसे इलाहाबाद घोषणा पत्र के नाम से जाना जाता है।
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● 1857 के विद्रोह से पूर्व ब्रिटिश और भारतीय सेना का अनुपात 1:5 था, 1857 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी में भारतीय सैनिकों की कुल संख्या 2,38,000 थी। विद्रोह के पश्चात् बंगाल प्रेसिडेन्सी में यूरोपीय और भारतीय सैनिकों का अनुपात 1:2 तथा मद्रास और बम्बई प्रेसिडेन्सी में 1:3 का अनुपात रखा गया।
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