अधिकाधिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ आजकल किन दावों को भी विधिक अधिकारों के रूप में मान्यता दे रही है ?
Anonymous Quiz
8%
नागरिकों के सांस्कृतिक दावे
27%
राजनीतिक अधिकारों को
12%
आर्थिक अधिकारों को
54%
1 , 2 , 3 तीनों
❤28👍20😁2🎉2🤩2
‘ राजस्थान रिसर्च सोसायटी ‘ कहां स्थित है ?
Anonymous Quiz
45%
जयपुर
23%
मुम्बई
25%
उदयपुर
8%
कोलकाता
👍32🎉12❤9😁7🤩4
30 अप्रैल , 1526 ई . को निम्न में से कौनसा युद्ध हुआ -
Anonymous Quiz
32%
खानवा का युद्ध
24%
पानीपत का दूसरा युद्ध
39%
पानीपत का पहला युद्ध
5%
हल्दीघाटी का युद्ध
❤27🤩15👍11😁3🎉2
प्राकृतिक संसाधनों की प्रकृति एवं उपलब्धता के आधार पर राजस्थान में उन उद्योगों के विकास की सर्वाधिक सम्भावनाएं है , जिनका आधार है -
Anonymous Quiz
10%
जल
45%
ऊर्जा
28%
पशुधन
18%
कृषि
👍35❤10🎉4🤩4😁3
सोटिंग भट्ट एवं धनेश्वर भट्ट नामक संस्कृत विद्वान किस मेवाड़ के शासक के दरबारी थे ?
Anonymous Quiz
14%
राणा हम्मीर
46%
महाराणा कुम्भा
25%
महाराणा सांगा
15%
महाराणा लाखा
👍24❤17🤩8🎉4😁2
निम्न में से राजस्थान का कौनसा शहर सीमेंट का सबसे बड़ा उत्पादक है -
Anonymous Quiz
4%
जयपुर
10%
जोधपुर
75%
चितौड़गढ़
11%
नागौर
❤24👍21🎉8🤩1
वायल क्या है ?
Anonymous Quiz
19%
स्त्रियों के पैरों की पायल
20%
एक सूती वस्त्र
30%
बढ़ई का एक औजार
32%
1 व 2 दोनों ही
👍30❤8😁2🎉2🤩2
#Current_Affairs_Update
😋😋 फूड सेफ्टी इंडेक्स 2021-22
जारीकर्ता= FSSAI(फूड स्टैंडर्ड एंड सिक्योरिटी अथॉरिटी ऑफ इंडिया)
प्रथम स्थान = तमिलनाडु
✅ राजस्थान== दसवां स्थान
Join us for more updates
@Taiyari_karlo
😋😋 फूड सेफ्टी इंडेक्स 2021-22
जारीकर्ता= FSSAI(फूड स्टैंडर्ड एंड सिक्योरिटी अथॉरिटी ऑफ इंडिया)
प्रथम स्थान = तमिलनाडु
✅ राजस्थान== दसवां स्थान
Join us for more updates
@Taiyari_karlo
👍39❤4🤩3😁1
👍69❤19😁12🎉12🤩12
राजस्थान राज्य वृक्ष ‘ खेजड़ी ‘
👉दर्जा :- 31 अक्टूबर , 1983 को।
👉5 जून 1988 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर खेजड़ी वृक्ष पर 60 पैसे का डाक टिकट जारी किया गया ।वैज्ञानिक नाम :- प्रोसेपिस सिनरेरिया है।
👉खेजड़ी को राजस्थान का कल्प वृक्ष, थार का कल्प वृक्ष , रेगिस्तान का गौरव आदि नामो से जाना जाता है।
👉खेजड़ीको Wonder Tree व भारतीय मरुस्थल का सुनहरा वृक्ष भी कहा जाता है । खेजड़ी के सर्वाधिक वृक्ष शेखावाटी क्षेत्र में देखे जा सकते है।
👉खेजड़ी के सर्वाधिक वृक्ष नागौर जिले में देखे जाते है।
👉खेजड़ी के वृक्ष की पूजा विजय दशमी / दशहरे ( आश्विन शुक्ल -10 ) के अवसर पर की जाती है।
खेजड़ी के वृक्ष के नीचे गोगा जी व झुंझार बाबा के मंदिर बने होते है।खेजड़ी को हरियाणवी व पंजाबी भाषा में जांटी के नाम से जाना जाता है। खेजड़ी को तमिल भाषा में पेयमेय के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को कन्नड़ भाषा में बन्ना-बन्नी के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को सिंधी भाषा में छोकड़ा के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को बंगाली भाषा में शाईगाछ के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को विश्नोई संप्रदाय में शमी के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को स्थानीय भाषा में सीमलो कहा जाता है।
👉खेजड़ी की हरी फलियां सांगरी (फल गर्मी में लगते है ) कहलाती है तथा पुष्प मींझर कहलाता है।
👉खेजड़ी कि सूखी फलियां खोखा कहलाती है । वैज्ञानिको ने खेजड़ी वृक्ष की आयु पांच हजार वर्ष बताई है ।
👉राज्य में सर्वाधिक प्राचीन खेजड़ी के दो वृक्ष एक हजार वर्ष पुराने मांगलियावास गांव ( अजमेर ) में है । मांगलियावास गांव में हरियाली अमावस्या (श्रावण) को वृक्ष मेला लगता है।
👉खेजड़ी के वृक्ष को सेलेस्ट्रेना व ग्लाइकोट्रमा नामक कीड़े नुकसान पंहुचा रहे है।
👉माटो :- बीकानेर के शासकों द्वारा प्रतीक चिन्ह के रूप रूपये में खेजड़ी के वृक्ष को अंकित करवाया।
👉ऑपरेशन खेजड़ा नामक अभियान 1991 में चलाया गया।
👉वन्य जीवो के रक्षा के लिए राज्य में सर्वप्रथम बलिदान 1604 में जोधपुर के रामसडी गांव में करमा व गौरा के द्वारा दिया गया
👉खेजड़ी के लिए प्रथम बलिदान अमृता देवी बिश्नोई ने 1730 में 363 लोगो के साथ जोधपुर के खेजड़ली ग्राम या गुढा बिश्नोई गांव में भाद्रपद शुक्ल दशमी को दिया।
👉भाद्रपद शुक्ल दशमी को विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला खेजड़ली गांव में लगता है । बिश्नोई सम्प्रदाय के द्वारा दिया गया यह बलिदान साका या खड़ाना कहलाता है।
👉इस बलिदान के समय जोधपुर का राजा अभयसिंह था। अभयसिंह के आदेश पर गिरधर दास के द्वारा 363 लोगों की हत्या की गई।
👉खेजड़ली दिवस प्रत्येक वर्ष 12 सितंबर को मनाया जाता है।
👉अमृता देवी वन्य जीव पुरस्कार की शुरुआत 1994 में की गई।
👉खेजड़ली आंदोलन चिपको आंदोलन का प्रेरणा स्त्रोत रहा है
╔══════════════════╗
📚 JOIN 🔜 @Taiyari_karlo 📚
╚══════════════════╝
👉दर्जा :- 31 अक्टूबर , 1983 को।
👉5 जून 1988 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर खेजड़ी वृक्ष पर 60 पैसे का डाक टिकट जारी किया गया ।वैज्ञानिक नाम :- प्रोसेपिस सिनरेरिया है।
👉खेजड़ी को राजस्थान का कल्प वृक्ष, थार का कल्प वृक्ष , रेगिस्तान का गौरव आदि नामो से जाना जाता है।
👉खेजड़ीको Wonder Tree व भारतीय मरुस्थल का सुनहरा वृक्ष भी कहा जाता है । खेजड़ी के सर्वाधिक वृक्ष शेखावाटी क्षेत्र में देखे जा सकते है।
👉खेजड़ी के सर्वाधिक वृक्ष नागौर जिले में देखे जाते है।
👉खेजड़ी के वृक्ष की पूजा विजय दशमी / दशहरे ( आश्विन शुक्ल -10 ) के अवसर पर की जाती है।
खेजड़ी के वृक्ष के नीचे गोगा जी व झुंझार बाबा के मंदिर बने होते है।खेजड़ी को हरियाणवी व पंजाबी भाषा में जांटी के नाम से जाना जाता है। खेजड़ी को तमिल भाषा में पेयमेय के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को कन्नड़ भाषा में बन्ना-बन्नी के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को सिंधी भाषा में छोकड़ा के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को बंगाली भाषा में शाईगाछ के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को विश्नोई संप्रदाय में शमी के नाम से जाना जाता है।
👉खेजड़ी को स्थानीय भाषा में सीमलो कहा जाता है।
👉खेजड़ी की हरी फलियां सांगरी (फल गर्मी में लगते है ) कहलाती है तथा पुष्प मींझर कहलाता है।
👉खेजड़ी कि सूखी फलियां खोखा कहलाती है । वैज्ञानिको ने खेजड़ी वृक्ष की आयु पांच हजार वर्ष बताई है ।
👉राज्य में सर्वाधिक प्राचीन खेजड़ी के दो वृक्ष एक हजार वर्ष पुराने मांगलियावास गांव ( अजमेर ) में है । मांगलियावास गांव में हरियाली अमावस्या (श्रावण) को वृक्ष मेला लगता है।
👉खेजड़ी के वृक्ष को सेलेस्ट्रेना व ग्लाइकोट्रमा नामक कीड़े नुकसान पंहुचा रहे है।
👉माटो :- बीकानेर के शासकों द्वारा प्रतीक चिन्ह के रूप रूपये में खेजड़ी के वृक्ष को अंकित करवाया।
👉ऑपरेशन खेजड़ा नामक अभियान 1991 में चलाया गया।
👉वन्य जीवो के रक्षा के लिए राज्य में सर्वप्रथम बलिदान 1604 में जोधपुर के रामसडी गांव में करमा व गौरा के द्वारा दिया गया
👉खेजड़ी के लिए प्रथम बलिदान अमृता देवी बिश्नोई ने 1730 में 363 लोगो के साथ जोधपुर के खेजड़ली ग्राम या गुढा बिश्नोई गांव में भाद्रपद शुक्ल दशमी को दिया।
👉भाद्रपद शुक्ल दशमी को विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला खेजड़ली गांव में लगता है । बिश्नोई सम्प्रदाय के द्वारा दिया गया यह बलिदान साका या खड़ाना कहलाता है।
👉इस बलिदान के समय जोधपुर का राजा अभयसिंह था। अभयसिंह के आदेश पर गिरधर दास के द्वारा 363 लोगों की हत्या की गई।
👉खेजड़ली दिवस प्रत्येक वर्ष 12 सितंबर को मनाया जाता है।
👉अमृता देवी वन्य जीव पुरस्कार की शुरुआत 1994 में की गई।
👉खेजड़ली आंदोलन चिपको आंदोलन का प्रेरणा स्त्रोत रहा है
╔══════════════════╗
📚 JOIN 🔜 @Taiyari_karlo 📚
╚══════════════════╝
👍73❤17🤩6🎉4
सहरिया जनजाति ( Saharia tribe )
सहरिया जाति को भारत सरकार ने आदिम जनजाति समूह (पी.टी.जी) में शामिल किया है। ये लोग मुख्यत: बारां जिले की शाहाबाद व किशनगढ़पंचायत समितियों में निवास करते हैं।
सहरिया शब्द सहरा से बना है जिसका अर्थ रेगिस्तानहोता है। इनका जन्म सहारा के रेगिस्तान में हुआ माना जाता है। मुगल आक्रमणों से त्रस्त होकर ये लोग भाग गए और झूम खेती करने लगे। सहराना – इनकी बस्ती को सहराना कहते है। इस जनजाति के गांव सहरोल कहलाते हैं।
सहरिया के पच्चास गौत्र हैं। इनमें चौहान और डोडिया गोत्र राजपूत गौत्र से मिलते हैं। सहरिया जनजाति के मुखिया को कोतवाल कहा जाता हैं। सहारिया जाति के लोग स्थायी वैवाहिक जीवन को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यद्यपि नाता प्रथा विवाहिता एवं कुंवारी दोनों मानते हैं। अतीत में नाता प्रथा के लिए स्रियों को शारीरिक दण्ड दिया जाता था, आजकल आर्थिक दंड व कोतवाल के हस्तक्षेप द्वारा मामला सुलटा लिया जाता है।
अन्य समाज में जो स्थान मुखिया व पटेल का होता है, वही स्थान सहरिया समाज में कोतवाल का होता है। सहरिया जनजाति के गुरू महर्षि वाल्मिकी है। इस जनजाति की सबसे बड़ी पंचायत चौरसिया कहलाती है, जिसका आयोजन सीता बाड़ी नामक स्थान परवाल्मिकी जी के मंदिर में होता है।
इस जाति के लोग हिन्दू त्यौहारों और देवी देवताओं से जुड़े धार्मिक उत्सव मनाते हैं, ये लोग तेजाजी को आराध्य के रूप में विशेष तौर पर मानते हैं। तेजाजी को इनका कुलदेवता माना जाता है।
तेजाजी की स्मृति में भंवरगढ़ में एक मेला लगता है जिसमें इस जनजाति के लोग बड़े ही उत्साह व श्रद्धा से भाग लेते हैं। ये लोग अपनी परम्परा के अनुसार उठकर स्रियों के साथ मिल – जुलकर नाचते गाते हैं तथा राई नृत्य का आयोजन करते हैं, होली के बाद के दिनों में ये सम्पन्न होता है।
सहरिया जनजाति की कुल देवी ‘कोडिया देवी’ कहलाती है। सहरिया जनजाति का सबसे बड़ा मेला ‘सीताबाड़ी का मेला’ है जो बारां जिले के सीताबाड़ी नामक स्थान पर वैशाख अमावस्या को भरता है। यह मेलाहाडौती आंचल का सबसे बड़ा मेला है। इस मेले कोसहरिया जनजाति का कुंभ कहते है।
इस जनजाति का एक अन्य मेला कपिल धारा का मेला है जो बारां जिले में कार्तिक पूर्णिमा को आयोजित होता है। सहरिया पुरूषों की अंगरखी को सलुका तथा इनके साफे को खफ्टा कहते हैं इनका जबकि इनकी धोतीपंछा कहलाती है। ये लोग स्थानांतरित कृषि करते हैं। इस जनजाति में भीख मांगना वर्जित है।
सहरिया जनजाति में लड़की का जन्म शुभ माना जाता है। इस जनजाति का प्रमुख नृत्य शिकारी नृत्य है। सहरिया जनजाति राज्य की सर्वाधिक पिछड़ी जनजाति होने के कारण भारत सरकार ने राज्य की केवल इसी जनजाति को आदिम जनजाति समूह की सूची में रखा गया है।
इनके सघन गाँव देखने को मिलते हैं। ये छितरेछतरीनुमा घरों में निवास करते हैं। इनके मिट्टी, पत्थर, लकडी और घासफूस के बने घरों को टापरी कहते है। इनका एक सामूहिक घर भी होता है जहां वे पंचायत आदि का भी आयोजन करते हैं। इसे वे ‘बंगला’ कहते हैं।
एक ही गाँव के लोगों के घरों के समूह को इनकी भाषा में ‘थोक’ कहा जाता है। इसे ही अन्य जाति समूह फला भी कहते हैं। ये लोग घने जंगलों में पेड़ों पर या बल्लियों पर जो मचाननुमा झोपड़ी बनाते है, उसको टोपा (गोपना, कोरूआ) कहते है। सहरिया लोग अनाज संग्रह हेतु मिट्टी से कोठियां बनाते हैं, जिन्हें कुसिला कहते हैं। इनके आटा संग्रह करने का पात्र भडेरी कहलाता है।
╔══════════════════╗
📚 JOIN 🔜 @Taiyari_karlo 📚
╚══════════════════╝
सहरिया जाति को भारत सरकार ने आदिम जनजाति समूह (पी.टी.जी) में शामिल किया है। ये लोग मुख्यत: बारां जिले की शाहाबाद व किशनगढ़पंचायत समितियों में निवास करते हैं।
सहरिया शब्द सहरा से बना है जिसका अर्थ रेगिस्तानहोता है। इनका जन्म सहारा के रेगिस्तान में हुआ माना जाता है। मुगल आक्रमणों से त्रस्त होकर ये लोग भाग गए और झूम खेती करने लगे। सहराना – इनकी बस्ती को सहराना कहते है। इस जनजाति के गांव सहरोल कहलाते हैं।
सहरिया के पच्चास गौत्र हैं। इनमें चौहान और डोडिया गोत्र राजपूत गौत्र से मिलते हैं। सहरिया जनजाति के मुखिया को कोतवाल कहा जाता हैं। सहारिया जाति के लोग स्थायी वैवाहिक जीवन को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यद्यपि नाता प्रथा विवाहिता एवं कुंवारी दोनों मानते हैं। अतीत में नाता प्रथा के लिए स्रियों को शारीरिक दण्ड दिया जाता था, आजकल आर्थिक दंड व कोतवाल के हस्तक्षेप द्वारा मामला सुलटा लिया जाता है।
अन्य समाज में जो स्थान मुखिया व पटेल का होता है, वही स्थान सहरिया समाज में कोतवाल का होता है। सहरिया जनजाति के गुरू महर्षि वाल्मिकी है। इस जनजाति की सबसे बड़ी पंचायत चौरसिया कहलाती है, जिसका आयोजन सीता बाड़ी नामक स्थान परवाल्मिकी जी के मंदिर में होता है।
इस जाति के लोग हिन्दू त्यौहारों और देवी देवताओं से जुड़े धार्मिक उत्सव मनाते हैं, ये लोग तेजाजी को आराध्य के रूप में विशेष तौर पर मानते हैं। तेजाजी को इनका कुलदेवता माना जाता है।
तेजाजी की स्मृति में भंवरगढ़ में एक मेला लगता है जिसमें इस जनजाति के लोग बड़े ही उत्साह व श्रद्धा से भाग लेते हैं। ये लोग अपनी परम्परा के अनुसार उठकर स्रियों के साथ मिल – जुलकर नाचते गाते हैं तथा राई नृत्य का आयोजन करते हैं, होली के बाद के दिनों में ये सम्पन्न होता है।
सहरिया जनजाति की कुल देवी ‘कोडिया देवी’ कहलाती है। सहरिया जनजाति का सबसे बड़ा मेला ‘सीताबाड़ी का मेला’ है जो बारां जिले के सीताबाड़ी नामक स्थान पर वैशाख अमावस्या को भरता है। यह मेलाहाडौती आंचल का सबसे बड़ा मेला है। इस मेले कोसहरिया जनजाति का कुंभ कहते है।
इस जनजाति का एक अन्य मेला कपिल धारा का मेला है जो बारां जिले में कार्तिक पूर्णिमा को आयोजित होता है। सहरिया पुरूषों की अंगरखी को सलुका तथा इनके साफे को खफ्टा कहते हैं इनका जबकि इनकी धोतीपंछा कहलाती है। ये लोग स्थानांतरित कृषि करते हैं। इस जनजाति में भीख मांगना वर्जित है।
सहरिया जनजाति में लड़की का जन्म शुभ माना जाता है। इस जनजाति का प्रमुख नृत्य शिकारी नृत्य है। सहरिया जनजाति राज्य की सर्वाधिक पिछड़ी जनजाति होने के कारण भारत सरकार ने राज्य की केवल इसी जनजाति को आदिम जनजाति समूह की सूची में रखा गया है।
इनके सघन गाँव देखने को मिलते हैं। ये छितरेछतरीनुमा घरों में निवास करते हैं। इनके मिट्टी, पत्थर, लकडी और घासफूस के बने घरों को टापरी कहते है। इनका एक सामूहिक घर भी होता है जहां वे पंचायत आदि का भी आयोजन करते हैं। इसे वे ‘बंगला’ कहते हैं।
एक ही गाँव के लोगों के घरों के समूह को इनकी भाषा में ‘थोक’ कहा जाता है। इसे ही अन्य जाति समूह फला भी कहते हैं। ये लोग घने जंगलों में पेड़ों पर या बल्लियों पर जो मचाननुमा झोपड़ी बनाते है, उसको टोपा (गोपना, कोरूआ) कहते है। सहरिया लोग अनाज संग्रह हेतु मिट्टी से कोठियां बनाते हैं, जिन्हें कुसिला कहते हैं। इनके आटा संग्रह करने का पात्र भडेरी कहलाता है।
╔══════════════════╗
📚 JOIN 🔜 @Taiyari_karlo 📚
╚══════════════════╝
👍57❤15🎉1