सहरिया जनजाति ( Saharia tribe )
सहरिया जाति को भारत सरकार ने आदिम जनजाति समूह (पी.टी.जी) में शामिल किया है। ये लोग मुख्यत: बारां जिले की शाहाबाद व किशनगढ़पंचायत समितियों में निवास करते हैं।
सहरिया शब्द सहरा से बना है जिसका अर्थ रेगिस्तानहोता है। इनका जन्म सहारा के रेगिस्तान में हुआ माना जाता है। मुगल आक्रमणों से त्रस्त होकर ये लोग भाग गए और झूम खेती करने लगे। सहराना – इनकी बस्ती को सहराना कहते है। इस जनजाति के गांव सहरोल कहलाते हैं।
सहरिया के पच्चास गौत्र हैं। इनमें चौहान और डोडिया गोत्र राजपूत गौत्र से मिलते हैं। सहरिया जनजाति के मुखिया को कोतवाल कहा जाता हैं। सहारिया जाति के लोग स्थायी वैवाहिक जीवन को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यद्यपि नाता प्रथा विवाहिता एवं कुंवारी दोनों मानते हैं। अतीत में नाता प्रथा के लिए स्रियों को शारीरिक दण्ड दिया जाता था, आजकल आर्थिक दंड व कोतवाल के हस्तक्षेप द्वारा मामला सुलटा लिया जाता है।
अन्य समाज में जो स्थान मुखिया व पटेल का होता है, वही स्थान सहरिया समाज में कोतवाल का होता है। सहरिया जनजाति के गुरू महर्षि वाल्मिकी है। इस जनजाति की सबसे बड़ी पंचायत चौरसिया कहलाती है, जिसका आयोजन सीता बाड़ी नामक स्थान परवाल्मिकी जी के मंदिर में होता है।
इस जाति के लोग हिन्दू त्यौहारों और देवी देवताओं से जुड़े धार्मिक उत्सव मनाते हैं, ये लोग तेजाजी को आराध्य के रूप में विशेष तौर पर मानते हैं। तेजाजी को इनका कुलदेवता माना जाता है।
तेजाजी की स्मृति में भंवरगढ़ में एक मेला लगता है जिसमें इस जनजाति के लोग बड़े ही उत्साह व श्रद्धा से भाग लेते हैं। ये लोग अपनी परम्परा के अनुसार उठकर स्रियों के साथ मिल – जुलकर नाचते गाते हैं तथा राई नृत्य का आयोजन करते हैं, होली के बाद के दिनों में ये सम्पन्न होता है।
सहरिया जनजाति की कुल देवी ‘कोडिया देवी’ कहलाती है। सहरिया जनजाति का सबसे बड़ा मेला ‘सीताबाड़ी का मेला’ है जो बारां जिले के सीताबाड़ी नामक स्थान पर वैशाख अमावस्या को भरता है। यह मेलाहाडौती आंचल का सबसे बड़ा मेला है। इस मेले कोसहरिया जनजाति का कुंभ कहते है।
इस जनजाति का एक अन्य मेला कपिल धारा का मेला है जो बारां जिले में कार्तिक पूर्णिमा को आयोजित होता है। सहरिया पुरूषों की अंगरखी को सलुका तथा इनके साफे को खफ्टा कहते हैं इनका जबकि इनकी धोतीपंछा कहलाती है। ये लोग स्थानांतरित कृषि करते हैं। इस जनजाति में भीख मांगना वर्जित है।
सहरिया जनजाति में लड़की का जन्म शुभ माना जाता है। इस जनजाति का प्रमुख नृत्य शिकारी नृत्य है। सहरिया जनजाति राज्य की सर्वाधिक पिछड़ी जनजाति होने के कारण भारत सरकार ने राज्य की केवल इसी जनजाति को आदिम जनजाति समूह की सूची में रखा गया है।
इनके सघन गाँव देखने को मिलते हैं। ये छितरेछतरीनुमा घरों में निवास करते हैं। इनके मिट्टी, पत्थर, लकडी और घासफूस के बने घरों को टापरी कहते है। इनका एक सामूहिक घर भी होता है जहां वे पंचायत आदि का भी आयोजन करते हैं। इसे वे ‘बंगला’ कहते हैं।
एक ही गाँव के लोगों के घरों के समूह को इनकी भाषा में ‘थोक’ कहा जाता है। इसे ही अन्य जाति समूह फला भी कहते हैं। ये लोग घने जंगलों में पेड़ों पर या बल्लियों पर जो मचाननुमा झोपड़ी बनाते है, उसको टोपा (गोपना, कोरूआ) कहते है। सहरिया लोग अनाज संग्रह हेतु मिट्टी से कोठियां बनाते हैं, जिन्हें कुसिला कहते हैं। इनके आटा संग्रह करने का पात्र भडेरी कहलाता है।
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सहरिया जाति को भारत सरकार ने आदिम जनजाति समूह (पी.टी.जी) में शामिल किया है। ये लोग मुख्यत: बारां जिले की शाहाबाद व किशनगढ़पंचायत समितियों में निवास करते हैं।
सहरिया शब्द सहरा से बना है जिसका अर्थ रेगिस्तानहोता है। इनका जन्म सहारा के रेगिस्तान में हुआ माना जाता है। मुगल आक्रमणों से त्रस्त होकर ये लोग भाग गए और झूम खेती करने लगे। सहराना – इनकी बस्ती को सहराना कहते है। इस जनजाति के गांव सहरोल कहलाते हैं।
सहरिया के पच्चास गौत्र हैं। इनमें चौहान और डोडिया गोत्र राजपूत गौत्र से मिलते हैं। सहरिया जनजाति के मुखिया को कोतवाल कहा जाता हैं। सहारिया जाति के लोग स्थायी वैवाहिक जीवन को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यद्यपि नाता प्रथा विवाहिता एवं कुंवारी दोनों मानते हैं। अतीत में नाता प्रथा के लिए स्रियों को शारीरिक दण्ड दिया जाता था, आजकल आर्थिक दंड व कोतवाल के हस्तक्षेप द्वारा मामला सुलटा लिया जाता है।
अन्य समाज में जो स्थान मुखिया व पटेल का होता है, वही स्थान सहरिया समाज में कोतवाल का होता है। सहरिया जनजाति के गुरू महर्षि वाल्मिकी है। इस जनजाति की सबसे बड़ी पंचायत चौरसिया कहलाती है, जिसका आयोजन सीता बाड़ी नामक स्थान परवाल्मिकी जी के मंदिर में होता है।
इस जाति के लोग हिन्दू त्यौहारों और देवी देवताओं से जुड़े धार्मिक उत्सव मनाते हैं, ये लोग तेजाजी को आराध्य के रूप में विशेष तौर पर मानते हैं। तेजाजी को इनका कुलदेवता माना जाता है।
तेजाजी की स्मृति में भंवरगढ़ में एक मेला लगता है जिसमें इस जनजाति के लोग बड़े ही उत्साह व श्रद्धा से भाग लेते हैं। ये लोग अपनी परम्परा के अनुसार उठकर स्रियों के साथ मिल – जुलकर नाचते गाते हैं तथा राई नृत्य का आयोजन करते हैं, होली के बाद के दिनों में ये सम्पन्न होता है।
सहरिया जनजाति की कुल देवी ‘कोडिया देवी’ कहलाती है। सहरिया जनजाति का सबसे बड़ा मेला ‘सीताबाड़ी का मेला’ है जो बारां जिले के सीताबाड़ी नामक स्थान पर वैशाख अमावस्या को भरता है। यह मेलाहाडौती आंचल का सबसे बड़ा मेला है। इस मेले कोसहरिया जनजाति का कुंभ कहते है।
इस जनजाति का एक अन्य मेला कपिल धारा का मेला है जो बारां जिले में कार्तिक पूर्णिमा को आयोजित होता है। सहरिया पुरूषों की अंगरखी को सलुका तथा इनके साफे को खफ्टा कहते हैं इनका जबकि इनकी धोतीपंछा कहलाती है। ये लोग स्थानांतरित कृषि करते हैं। इस जनजाति में भीख मांगना वर्जित है।
सहरिया जनजाति में लड़की का जन्म शुभ माना जाता है। इस जनजाति का प्रमुख नृत्य शिकारी नृत्य है। सहरिया जनजाति राज्य की सर्वाधिक पिछड़ी जनजाति होने के कारण भारत सरकार ने राज्य की केवल इसी जनजाति को आदिम जनजाति समूह की सूची में रखा गया है।
इनके सघन गाँव देखने को मिलते हैं। ये छितरेछतरीनुमा घरों में निवास करते हैं। इनके मिट्टी, पत्थर, लकडी और घासफूस के बने घरों को टापरी कहते है। इनका एक सामूहिक घर भी होता है जहां वे पंचायत आदि का भी आयोजन करते हैं। इसे वे ‘बंगला’ कहते हैं।
एक ही गाँव के लोगों के घरों के समूह को इनकी भाषा में ‘थोक’ कहा जाता है। इसे ही अन्य जाति समूह फला भी कहते हैं। ये लोग घने जंगलों में पेड़ों पर या बल्लियों पर जो मचाननुमा झोपड़ी बनाते है, उसको टोपा (गोपना, कोरूआ) कहते है। सहरिया लोग अनाज संग्रह हेतु मिट्टी से कोठियां बनाते हैं, जिन्हें कुसिला कहते हैं। इनके आटा संग्रह करने का पात्र भडेरी कहलाता है।
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👍57❤15🎉1
भोजन थाली मेला राजस्थान के किस जिले में आयोजित होता है-
Anonymous Quiz
14%
अलवर
54%
भरतपुर
25%
भीलवाड़ा
6%
चितौड़गढ़
👍42🤩30❤19😁7🎉4
राजस्थान के प्रसिद्ध पुष्कर मेले का आयोजन कब किया जाता है
Anonymous Quiz
77%
(अ) कार्तिक में
11%
(ब) बैसाख में
8%
(स) फाल्गुन में
4%
(द) चैत्र में
👍49❤16🤩7😁5🎉5
👍47❤16😁6🤩6🎉5
प्रसिद्ध आदिवासी मेला वेणेश्वर किस जिले में आयोजित होता है
Anonymous Quiz
16%
बांसवाड़ा
79%
डूंगरपूर
4%
बांरा
2%
उदयपुर
❤36👍32🤩11🎉3😁2
❤42👍38🎉9🤩9😁7
Chittorgarh Jila Darshan By-S.L. AHEER SIR.pdf
4.2 MB
CLASS LINK👇👇👇👇
https://youtu.be/SP7jRZf9tg4
https://youtu.be/SP7jRZf9tg4
👍19❤7🎉4
राजस्थान की कला संस्कृति से संबंधित शब्द
कोपी➖ ऊँट के चमड़े से बने विशेष जलपात्र को कोपीकहते हैं इसे बिकानेर में बनाया जाता है
वील➖ ग्रामीण महिलाओं द्वारा घर को सजाने और छोटी मोटी दैनिक उपयोगी चीजों को सुरक्षित रखने की एक अलंकृत महलनुमा आकृति है इस आकृति को बांस की खपच्चियों पर लीदयुक्त मिट्टी चिपकाकर कांच के टुकड़ोंसे बनाया जाता है
हुंडा भाड़ा➖ मध्यकाल में राजस्थान में बीमा को हुंडा भाड़ा कहा जाता था जिसमें यह लिखा जाता था कि चोरी लूटपाट के लिए वे जिम्मेदारहैं
चतरा चौथ➖ संपूर्ण डांग क्षेत्र मे गणेश चतुर्थी के त्योहार को चतरा चौथ कहते हैं विशेष तौर से सवाई माधोपुर व उससे लगते जिलों में गणेश चतुर्थी का त्योहार इसी नाम से जाना जाता है
बालद➖ यह बंजारे के बैलों का समूह होता है इसमें बैलों की पीठ पर माल-मिश्री ,गुड, शक्कर ,मेंवे, अनाज लादकर देश परदेश व्यापारहेतु जाते थे
चेहल्लम➖ मुसलमानों में मृत्यु के 40 दिन बाद 40 वा मनाया जाता है इसे चेहल्लम कहते हैं इस दिन कुरान का पाठ कर दावत दी जाती है
धरेजा➖ वह व्यक्ति जिसका विवाह नहीं होपाया है या विधूर हो और वह ऐसी स्त्री जिसका विवाह नहीं हो पाया या विधवाहो को आपसी सहमति से घर ले आना धरेजा कहलाता है
देरी-सेरी➖ यह 15 जैन मंदिरों का कतारबद्ध समूहहै यह समूह सिरोही राज महल के निकटस्थित है
धनक➖ बड़ी-बड़ी चौकोर बूँदों से युक्त अलंकरण धनक कहलाता है
निर्मोही व्यास➖ यह एक नाट्य लेखक व रंगकर्मी थे इनका संबंध राज्य के बीकानेर जिलेसे था यह रंगमंच के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानितहै अनामिका समय के सांचे,शब्दों की बौछार सहित कई रचनाएंकी थी
खरड➖ यह जवाहरात का मुख्य कच्चा माल होता है किसी भी हीरे जवाहरात का खान से प्राकृतिक रूप से निकलने वाला पत्थर हीरे जवाहरात की खरड़ या रफ कहलाती है
गोवर्धन➖ मारवाड़ में वीर पुरुषों के गौ रक्षार्थ दिवगंतहो जाने पर जो समाधि-स्थल बने होते हैं उन्हें गोवर्धन कहते हैं क्योंकि कृष्ण गोवर्धन धारण किए होते हैं
नैडा अंचल➖ राजस्थान के अलवर जिले में स्थित है यह स्थान सरिस्का वनश्रीसे संपन्न है साथ ही प्राचीन कला और शिल्प काभी यहां बहुत बड़ा खजाना मौजूदहै यहां की छतरियां भित्ति चित्रण के तत्कालीन स्थापत्य को दर्शाती है
जस्मा ओडन➖ शांता गांधी द्वारा लिखित भवाई शैली की लोक नाटिकाहै जो सगौजी और सगीजी के रूप में भोपा-भोपी द्वारा प्रस्तुत की जाती है
लाल्या-काल्या मेला➖ यह मेला अजमेर शहर का एक ऐतिहासिकमेला है जो करीब 350 साल से भरता आ रहा है इसमें लाल्या वराह भगवान और काल्या हिरण्याक्षका प्रतीक है यह मेला नरसिंह चतुर्दशी को भरता है होलिका का रूप में नकटी धरती है
आन प्रथा➖ मेवाड़ में महाराणा के प्रति ली जाने वाली स्वामी भक्ति की शपथ आन प्रथा कहलाती है जिसे 1863 में ब्रिटिश सरकार ने एक आदेश से बंद कर दिया था
पेटिया प्रथा➖ यह प्रथा डूंगरपुर रियासत में प्रचलित थी इस प्रथा के अंतर्गत डूंगरपुर रियासतके किसी भी अधिकारी या सामान्य कर्मचारीद्वारा सरकारी काम से किसी स्थान पर रुकनेपर उसके व साथियों के भोजन की निशुल्क व्यवस्था संबंधित ग्राम वासियोंको करनी पड़ती थी
इजारा➖ राजस्थान की देसी रियासतों में प्रचलित भूराजस्व की एक प्रणाली थी इस प्रणाली में सबसे ऊंची बोलीलगाने वाले को वह कृषि भूमि निश्चित अवधि के लिए जोतने हेतु दे दी जाती थी
फरका साग➖ यह एक प्रकार का साग है यह मरुस्थल और चट्टानी क्षेत्रोंमें झाडी फोग के रूपमे मिलती है झाड़ी फोग के फूलों को फरकाकहते हैं इन फूलों से बनने वाले साग को फरका साग कहते हैं
चौखा और बुगता➖ मेवाड़ शैलीकी प्रसिध्द उपशैली देवगढ़ शैली हैयह शैली 18वीं 19 वीं शताब्दीमें फली-फूली थी इस शैली में तीन प्रसिद्ध चित्रकार चौखा,बुगताऔर केवलाथे
रासधारी➖ रासलीला में अभिनयकरने वाला कलाकार होता है जो श्रीकृष्ण के जीवन चरित्रपर आधारित होती है जिसमें श्री कृष्ण के जीवन की विविध लीलाएं अभिनीत की जाती है
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कोपी➖ ऊँट के चमड़े से बने विशेष जलपात्र को कोपीकहते हैं इसे बिकानेर में बनाया जाता है
वील➖ ग्रामीण महिलाओं द्वारा घर को सजाने और छोटी मोटी दैनिक उपयोगी चीजों को सुरक्षित रखने की एक अलंकृत महलनुमा आकृति है इस आकृति को बांस की खपच्चियों पर लीदयुक्त मिट्टी चिपकाकर कांच के टुकड़ोंसे बनाया जाता है
हुंडा भाड़ा➖ मध्यकाल में राजस्थान में बीमा को हुंडा भाड़ा कहा जाता था जिसमें यह लिखा जाता था कि चोरी लूटपाट के लिए वे जिम्मेदारहैं
चतरा चौथ➖ संपूर्ण डांग क्षेत्र मे गणेश चतुर्थी के त्योहार को चतरा चौथ कहते हैं विशेष तौर से सवाई माधोपुर व उससे लगते जिलों में गणेश चतुर्थी का त्योहार इसी नाम से जाना जाता है
बालद➖ यह बंजारे के बैलों का समूह होता है इसमें बैलों की पीठ पर माल-मिश्री ,गुड, शक्कर ,मेंवे, अनाज लादकर देश परदेश व्यापारहेतु जाते थे
चेहल्लम➖ मुसलमानों में मृत्यु के 40 दिन बाद 40 वा मनाया जाता है इसे चेहल्लम कहते हैं इस दिन कुरान का पाठ कर दावत दी जाती है
धरेजा➖ वह व्यक्ति जिसका विवाह नहीं होपाया है या विधूर हो और वह ऐसी स्त्री जिसका विवाह नहीं हो पाया या विधवाहो को आपसी सहमति से घर ले आना धरेजा कहलाता है
देरी-सेरी➖ यह 15 जैन मंदिरों का कतारबद्ध समूहहै यह समूह सिरोही राज महल के निकटस्थित है
धनक➖ बड़ी-बड़ी चौकोर बूँदों से युक्त अलंकरण धनक कहलाता है
निर्मोही व्यास➖ यह एक नाट्य लेखक व रंगकर्मी थे इनका संबंध राज्य के बीकानेर जिलेसे था यह रंगमंच के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानितहै अनामिका समय के सांचे,शब्दों की बौछार सहित कई रचनाएंकी थी
खरड➖ यह जवाहरात का मुख्य कच्चा माल होता है किसी भी हीरे जवाहरात का खान से प्राकृतिक रूप से निकलने वाला पत्थर हीरे जवाहरात की खरड़ या रफ कहलाती है
गोवर्धन➖ मारवाड़ में वीर पुरुषों के गौ रक्षार्थ दिवगंतहो जाने पर जो समाधि-स्थल बने होते हैं उन्हें गोवर्धन कहते हैं क्योंकि कृष्ण गोवर्धन धारण किए होते हैं
नैडा अंचल➖ राजस्थान के अलवर जिले में स्थित है यह स्थान सरिस्का वनश्रीसे संपन्न है साथ ही प्राचीन कला और शिल्प काभी यहां बहुत बड़ा खजाना मौजूदहै यहां की छतरियां भित्ति चित्रण के तत्कालीन स्थापत्य को दर्शाती है
जस्मा ओडन➖ शांता गांधी द्वारा लिखित भवाई शैली की लोक नाटिकाहै जो सगौजी और सगीजी के रूप में भोपा-भोपी द्वारा प्रस्तुत की जाती है
लाल्या-काल्या मेला➖ यह मेला अजमेर शहर का एक ऐतिहासिकमेला है जो करीब 350 साल से भरता आ रहा है इसमें लाल्या वराह भगवान और काल्या हिरण्याक्षका प्रतीक है यह मेला नरसिंह चतुर्दशी को भरता है होलिका का रूप में नकटी धरती है
आन प्रथा➖ मेवाड़ में महाराणा के प्रति ली जाने वाली स्वामी भक्ति की शपथ आन प्रथा कहलाती है जिसे 1863 में ब्रिटिश सरकार ने एक आदेश से बंद कर दिया था
पेटिया प्रथा➖ यह प्रथा डूंगरपुर रियासत में प्रचलित थी इस प्रथा के अंतर्गत डूंगरपुर रियासतके किसी भी अधिकारी या सामान्य कर्मचारीद्वारा सरकारी काम से किसी स्थान पर रुकनेपर उसके व साथियों के भोजन की निशुल्क व्यवस्था संबंधित ग्राम वासियोंको करनी पड़ती थी
इजारा➖ राजस्थान की देसी रियासतों में प्रचलित भूराजस्व की एक प्रणाली थी इस प्रणाली में सबसे ऊंची बोलीलगाने वाले को वह कृषि भूमि निश्चित अवधि के लिए जोतने हेतु दे दी जाती थी
फरका साग➖ यह एक प्रकार का साग है यह मरुस्थल और चट्टानी क्षेत्रोंमें झाडी फोग के रूपमे मिलती है झाड़ी फोग के फूलों को फरकाकहते हैं इन फूलों से बनने वाले साग को फरका साग कहते हैं
चौखा और बुगता➖ मेवाड़ शैलीकी प्रसिध्द उपशैली देवगढ़ शैली हैयह शैली 18वीं 19 वीं शताब्दीमें फली-फूली थी इस शैली में तीन प्रसिद्ध चित्रकार चौखा,बुगताऔर केवलाथे
रासधारी➖ रासलीला में अभिनयकरने वाला कलाकार होता है जो श्रीकृष्ण के जीवन चरित्रपर आधारित होती है जिसमें श्री कृष्ण के जीवन की विविध लीलाएं अभिनीत की जाती है
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राजस्थान का कौन सा समाज वीर बिग्गाजी को कुलदेवता मानता है
Anonymous Quiz
9%
भाम्भू
17%
ताकड़
70%
जाखड़
3%
कूकना
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करौली के यदुवंशी राजवंश की कुलदेवी का नाम बताइए-
Anonymous Quiz
7%
जीण माता
14%
करणी माता
76%
कैला देवी
3%
शीतला माता
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