राजस्थान का इतिहास की धमाकेदार क्लास चल रही है आप सभी आ जाओ 👆👆👆
राजस्थान में पत्थर मार होली के लिए प्रसिद्ध हैं ?
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10%
बीकानेर
64%
बाड़मेर
15%
अलवर
10%
सवाईमाधोपुर
राजस्थान में लट्ठमार होली मनायी जाती हैं ।
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9%
जयपुर
28%
बाड़मेर
52%
महावीर जी
10%
कोटा
राजस्थान में माता कुंडालिनी का मेला बैसाख सुदी पूर्णिमा को लगता हैं ?
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8%
रामदेवरा (पोकरण )
56%
राश्मी (चित्तौड़गढ़)
27%
धुलेव (मेवाड़ )
9%
चारभुजा (उदयपुर )
देकची मार / बाल्टी मार होली कहाँ की प्रसिद्ध है
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26%
नाथद्वारा
43%
ब्यावर
23%
बीकानेर
8%
नागौर
गजसिंह को 'दलथम्बन' की उपाधि किस मुगल शासक ने दी थी
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19%
शाहजंहा
46%
जहांगीर
19%
अकबर
16%
औरंगजेब
राणीसर और पद्मसागर जलाशय किस दुर्ग में स्थित है
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17%
कुंभलगढ़ दुर्ग
47%
चितौड़गढ़ दुर्ग
26%
मेहरानगढ़ दुर्ग
10%
तारागढ़ दुर्ग (अजमेर)
राजस्थान की चित्र शैलियां (पार्ट-1)
राजस्थान की चित्रकला शैली पर गुजरात तथा कश्मीर की शैलियों का प्रभाव रहा है।
राजस्थानी चित्रकला के विषय
1. पशु-पक्षियों का चित्रण 2. शिकारी दृश्य 3. दरबार के दृश्य 4. नारी सौन्दर्य 5. धार्मिक ग्रन्थों का चित्रण आदि
राजस्थानी चित्रकला शैलियों की मूल शैली मेवाड़ शैली है।
सर्वप्रथम आनन्द कुमार स्वामी ने सन् 1916 ई. में अपनी पुस्तक "राजपुताना पेन्टिग्स" में राजस्थानी चित्रकला का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया।
भौगौलिक आधार पर राजस्थानी चित्रकला शैली को चार भागों में बांटा गया है। जिन्हें स्कूलस कहा जाता है।
1.मेवाड़ स्कूल:- उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, चावण्ड शैली, देवगढ़ शैली, शाहपुरा, शैली।
2.मारवाड़ स्कूल:- जोधपुर शैली, बीकानेर शैली जैसलमेर शैली, नागौर शैली, किशनगढ़ शैली।
3.ढुढाड़ स्कूल:- जयपुर शैली, आमेर शैली, उनियारा शैली, शेखावटी शैली, अलवर शैली।
4.हाडौती स्कूल:- कोटा शैली, बुंदी शैली, झालावाड़ शैली।
शैलियों की पृष्ठभूमि का रंग
हरा - जयपुर की अलवर शैली
गुलाबी/श्वेत - किशनगढ शैली
नीला - कोटा शैली
सुनहरी - बूंदी शैली
पीला - जोधपुर व बीकानेर शैली
लाल - मेवाड़ शैली
पशु तथा पक्षी
हाथी व चकोर - मेवाड़ शैली
चील/कौआ व ऊंठ - जोधपुर तथा बीकानेर शैली
हिरण/शेर व बत्तख - कोटा तथा बूंदी शैली
अश्व व मोर:- जयपुर व अलवर शैली
गाय व मोर - नाथद्वारा शैली
वृक्ष
पीपल/बरगद - जयपुर तथा अलवर शैली
खजूर - कोटा तथा बूंदी शैली
आम - जोधपुर तथा बीकानेर शैली
कदम्ब - मेवाड़ शैली
केला - नाथद्वारा शैली
नयन/आंखे
खंजर समान - बीकानेर शैली
मृग समान - मेवाड शैली
आम्र पर्ण - कोटा व बूंदी शैली
मीन कृत:- जयपुर व अलवर शैली
कमान जैसी - किशनगढ़ शैली
बादाम जैसी - जोधपुर शैली
1. मेवाड़ स्कूल
उदयपुर शैली
राजस्थानी चित्रकला की मूल शैली है।
शैली का प्रारम्भिक विकास कुम्भा के काल में हुआ।
शैली का स्वर्णकाल जगत सिंह प्रथम का काल रहा।
महाराणा जगत सिंह के समय उदयपुर के राजमहलों में "चितेरोंरी ओवरी" नामक कला विद्यालय खोला गया जिसे "तस्वीरों रो कारखानों "भी कहा जाता है।
विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतन्त्र नामक ग्रन्थ में पशु-पक्षियों की कहानियों के माध्यम से मानव जीवन के सिद्वान्तों को समझाया गया है।
पंचतन्त्र का फारसी अनुवाद "कलिला दमना" है, जो एक रूपात्मक कहानी है। इसमें राजा तथा उसके दो मंत्रियों कलिता व दमना का वर्णन किया गया है।
उदयपुर शैली में कलिला और दमना नाम से चित्र चित्रित किए गए थे।
सन 1260-61 ई. में मेवाड़ के महाराणा तेजसिंह के काल में इस शैली का प्रारम्भिक चित्र श्रावक प्रतिकर्मण सूत्र चूर्णि आहड़ में चित्रित किया गया। जिसका चित्रकार कमलचंद था।
सन् 1423 ई. में महाराणा मोकल के समय सुपासनह चरियम नामक चित्र चित्रकार हिरानंद के द्वारा चित्रित किया गया।
प्रमुख चित्रकार - मनोहर लाल, साहिबदीन (महाराणा जगत सिंह -प्रथम के दरबारी चित्रकार) कृपा राम, अमरा आदि।
चित्रित ग्रन्थ - 1. आर्श रामायण - मनोहर व साहिबदीन द्वारा। 2. गीत गोविन्द - साहबदीन द्वारा।
चित्रित विषय -मेवाड़ चित्रकला शैली में धार्मिक विषयों का चित्रण किया गया।
इस शैली में रामायण, महाभारत, रसिक प्रिया, गीत गोविन्द इत्यादि ग्रन्थों पर चित्र बनाए गए। मेवाड़ चित्रकला शैली पर गुर्जर तथा जैन शैली का प्रभाव रहा है।
नाथ द्वारा शैली
नाथ द्वारा मेवाड़ रियासत के अन्र्तगत आता था, जो वर्तमान में राजसमंद जिले में स्थित है।
यहां स्थित श्री नाथ जी मंदिर का निर्माण मेवाड़ के महाराजा राजसिंह न 1671-72 में करवाया था।
यह मंदिर पिछवाई कला के लिए प्रसिद्ध है, जो वास्तव में नाथद्वारा शैली का रूप है।
इस चित्रकला शैली का विकास मथुरा के कलाकारों द्वारा किया गया।
महाराजा राजसिंह का काल इस शैली का स्वर्ण काल कहलाता है।
चित्रित विषय - श्री कृष्ण की बाल लीलाऐं, गतालों का चित्रण, यमुना स्नान, अन्नकूट महोत्सव आदि।
चित्रकार - खेतदान, घासीराम आदि।
देवगढ़ शैली
इस शैली का प्रारम्भिक विकास महाराजा द्वाारिकादास चुडावत के समय हुआ।
इस शैली को प्रसिद्धी दिलाने का श्रेय डाॅ. श्रीधर अंधारे को है।
चित्रकार - बगला, कंवला, चीखा/चोखा, बैजनाथ आदि।
शाहपुरा शैली
यह शैली भीलवाडा जिले के शाहपुरा कस्बे में विकसित हुई।
शाहपुरा की प्रसिद्ध कला फडु चित्रांकन में इस चित्रकला शैली का प्रयोग किया जाता है।
फड़ चित्रांकन में यहां का जोशी परिवार लगा हुआ है।
श्री लाल जोशी, दुर्गादास जोशी, पार्वती जोशी (पहली महिला फड़ चित्रकार) आदि
चित्र - हाथी व घोड़ों का संघर्ष (चित्रकास्ताजू)
चावण्ड शैली
इस शैली का प्रारम्भिक विकास महाराणा प्रताप के काल में हुआ।
स्वर्णकाल -अमरसिंह प्रथम का काल माना जाता है।
चित्रकार - जीसारदीन इस शैली का चित्रकार हैं
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राजस्थान की चित्रकला शैली पर गुजरात तथा कश्मीर की शैलियों का प्रभाव रहा है।
राजस्थानी चित्रकला के विषय
1. पशु-पक्षियों का चित्रण 2. शिकारी दृश्य 3. दरबार के दृश्य 4. नारी सौन्दर्य 5. धार्मिक ग्रन्थों का चित्रण आदि
राजस्थानी चित्रकला शैलियों की मूल शैली मेवाड़ शैली है।
सर्वप्रथम आनन्द कुमार स्वामी ने सन् 1916 ई. में अपनी पुस्तक "राजपुताना पेन्टिग्स" में राजस्थानी चित्रकला का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया।
भौगौलिक आधार पर राजस्थानी चित्रकला शैली को चार भागों में बांटा गया है। जिन्हें स्कूलस कहा जाता है।
1.मेवाड़ स्कूल:- उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, चावण्ड शैली, देवगढ़ शैली, शाहपुरा, शैली।
2.मारवाड़ स्कूल:- जोधपुर शैली, बीकानेर शैली जैसलमेर शैली, नागौर शैली, किशनगढ़ शैली।
3.ढुढाड़ स्कूल:- जयपुर शैली, आमेर शैली, उनियारा शैली, शेखावटी शैली, अलवर शैली।
4.हाडौती स्कूल:- कोटा शैली, बुंदी शैली, झालावाड़ शैली।
शैलियों की पृष्ठभूमि का रंग
हरा - जयपुर की अलवर शैली
गुलाबी/श्वेत - किशनगढ शैली
नीला - कोटा शैली
सुनहरी - बूंदी शैली
पीला - जोधपुर व बीकानेर शैली
लाल - मेवाड़ शैली
पशु तथा पक्षी
हाथी व चकोर - मेवाड़ शैली
चील/कौआ व ऊंठ - जोधपुर तथा बीकानेर शैली
हिरण/शेर व बत्तख - कोटा तथा बूंदी शैली
अश्व व मोर:- जयपुर व अलवर शैली
गाय व मोर - नाथद्वारा शैली
वृक्ष
पीपल/बरगद - जयपुर तथा अलवर शैली
खजूर - कोटा तथा बूंदी शैली
आम - जोधपुर तथा बीकानेर शैली
कदम्ब - मेवाड़ शैली
केला - नाथद्वारा शैली
नयन/आंखे
खंजर समान - बीकानेर शैली
मृग समान - मेवाड शैली
आम्र पर्ण - कोटा व बूंदी शैली
मीन कृत:- जयपुर व अलवर शैली
कमान जैसी - किशनगढ़ शैली
बादाम जैसी - जोधपुर शैली
1. मेवाड़ स्कूल
उदयपुर शैली
राजस्थानी चित्रकला की मूल शैली है।
शैली का प्रारम्भिक विकास कुम्भा के काल में हुआ।
शैली का स्वर्णकाल जगत सिंह प्रथम का काल रहा।
महाराणा जगत सिंह के समय उदयपुर के राजमहलों में "चितेरोंरी ओवरी" नामक कला विद्यालय खोला गया जिसे "तस्वीरों रो कारखानों "भी कहा जाता है।
विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतन्त्र नामक ग्रन्थ में पशु-पक्षियों की कहानियों के माध्यम से मानव जीवन के सिद्वान्तों को समझाया गया है।
पंचतन्त्र का फारसी अनुवाद "कलिला दमना" है, जो एक रूपात्मक कहानी है। इसमें राजा तथा उसके दो मंत्रियों कलिता व दमना का वर्णन किया गया है।
उदयपुर शैली में कलिला और दमना नाम से चित्र चित्रित किए गए थे।
सन 1260-61 ई. में मेवाड़ के महाराणा तेजसिंह के काल में इस शैली का प्रारम्भिक चित्र श्रावक प्रतिकर्मण सूत्र चूर्णि आहड़ में चित्रित किया गया। जिसका चित्रकार कमलचंद था।
सन् 1423 ई. में महाराणा मोकल के समय सुपासनह चरियम नामक चित्र चित्रकार हिरानंद के द्वारा चित्रित किया गया।
प्रमुख चित्रकार - मनोहर लाल, साहिबदीन (महाराणा जगत सिंह -प्रथम के दरबारी चित्रकार) कृपा राम, अमरा आदि।
चित्रित ग्रन्थ - 1. आर्श रामायण - मनोहर व साहिबदीन द्वारा। 2. गीत गोविन्द - साहबदीन द्वारा।
चित्रित विषय -मेवाड़ चित्रकला शैली में धार्मिक विषयों का चित्रण किया गया।
इस शैली में रामायण, महाभारत, रसिक प्रिया, गीत गोविन्द इत्यादि ग्रन्थों पर चित्र बनाए गए। मेवाड़ चित्रकला शैली पर गुर्जर तथा जैन शैली का प्रभाव रहा है।
नाथ द्वारा शैली
नाथ द्वारा मेवाड़ रियासत के अन्र्तगत आता था, जो वर्तमान में राजसमंद जिले में स्थित है।
यहां स्थित श्री नाथ जी मंदिर का निर्माण मेवाड़ के महाराजा राजसिंह न 1671-72 में करवाया था।
यह मंदिर पिछवाई कला के लिए प्रसिद्ध है, जो वास्तव में नाथद्वारा शैली का रूप है।
इस चित्रकला शैली का विकास मथुरा के कलाकारों द्वारा किया गया।
महाराजा राजसिंह का काल इस शैली का स्वर्ण काल कहलाता है।
चित्रित विषय - श्री कृष्ण की बाल लीलाऐं, गतालों का चित्रण, यमुना स्नान, अन्नकूट महोत्सव आदि।
चित्रकार - खेतदान, घासीराम आदि।
देवगढ़ शैली
इस शैली का प्रारम्भिक विकास महाराजा द्वाारिकादास चुडावत के समय हुआ।
इस शैली को प्रसिद्धी दिलाने का श्रेय डाॅ. श्रीधर अंधारे को है।
चित्रकार - बगला, कंवला, चीखा/चोखा, बैजनाथ आदि।
शाहपुरा शैली
यह शैली भीलवाडा जिले के शाहपुरा कस्बे में विकसित हुई।
शाहपुरा की प्रसिद्ध कला फडु चित्रांकन में इस चित्रकला शैली का प्रयोग किया जाता है।
फड़ चित्रांकन में यहां का जोशी परिवार लगा हुआ है।
श्री लाल जोशी, दुर्गादास जोशी, पार्वती जोशी (पहली महिला फड़ चित्रकार) आदि
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चावण्ड शैली
इस शैली का प्रारम्भिक विकास महाराणा प्रताप के काल में हुआ।
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29 मार्च के Test का शेड्यूल
ये Test 29 March शाम 4:00 बजे प्रारंभ होगा......
जिन भी विद्यार्थियों ने यह ... टेस्ट सीरीज नहीं ली है वह ले ले... यह टेस्ट सीरीज पूरे 5 महीने चलने वाली है.. इसमें आप का संपूर्ण पाठ्यक्रम बहुत अच्छे तरीके से कवर हो जाएगा
इसमें आपको संपूर्ण एनसीआरटी व अन्य सभी प्रतियोगी पुस्तक कवर की जाएगी....
✳️150 टेस्ट सीरीज की विस्तृत जानकारी के लिए इस मैसेज को पढ़े :- https://t.me/Taiyari_karlo/12229
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"होली का आध्यात्मिक रहस्य"
भारत में अनेक त्यौहार मनाए जाते हैं उनमें से 'होली' का पवित्र त्यौहार बहुत उमंग उत्साह और खुशियों से मनाया जाता है। उसमें होली जलाते , एक दूसरे से मंगल मिलन मनाते हुए मुंख मीठा करते हैं। एक दूसरे को रंग लगाते हुए होली मनाते है।
होली माना- हो गई। बीती सो बीती। और दूसरा होली माना- पवित्र। हमारे जीवन में कुछ ऐसी घटनाए और परिस्थितियां आती है।उनके चिंतन से हम स्वयं दुखी और परेशान रहते है। कई बार हमारे बातों से या व्यवहार से दूसरे लोग भी दुखी और परेशान होते है। इन पुरानी बातों को बीती सो बीती! माना बिंदी लगाकर स्टॉप करने से पुरानी बातों को भूल कर अच्छे,और शुभ भावना वाले श्रेष्ठ विचार मन में लाकर फिर से हम पुनः खुशियों से आनंद से जीवन जी सकते हैं।
होली रात्रि को जलाते हैं। इस कलयुग के अज्ञान रूपी अंधकार की रात्री में हम मनुष्य आत्माएं देह भान में आकर काम ,क्रोध, लोभ, मोह ,और अहंकार के वश होकर, कर्म कर रहे हैं इसलिए लड़ाई झगड़े, कर्मभोग और बीमारी के कारण मनुष्य जीवन दु:खी अशांत हो चुका है। ऐसे समय पर हम मनुष्य आत्माओं के पिता परमात्मा शिव, सृष्टि के रचयिता इस धरती पर आकर ! हमें आत्मा का और परमात्मा का सत्य परिचय देकर सृष्टि चक्र का ज्ञान देकर, राजयोग सिखलाते हैं।
योग अग्नि से हमारे अंदर कि बुराई और असुरी संस्कार भस्म कर परमात्मा पिता के साथ हम मंगल मिलन मनाते हैं। जिससे आत्मा पवित्र और शुद्ध बनने से खुशी, आनंद और सुख मिलता है। इसका यादगार होली जलाकर एक दूसरे से खुशियों से मिलन मनाते है।
होली जलाने के बाद रंग लगाते हैं। इस कलयुग में हम आत्मा यह शरीर रूपी वस्त्र के संग के कारण कर्मेंद्रियों के अधीन होकर कर्म करती है इसलिए मनुष्य आत्माएं दुखी और अशांत हो गए हैं। हम मनुष्य आत्माओं को परमात्मा पिता ने आकर ज्ञान का रंग आत्मा को लगाया जिससे आत्मा के अंदर पवित्रता, सुख, शांति ,प्रेम ,आनंद और शक्ति यह आत्मा के ओरिजिनल गुणों का, अविनाशी पक्का रंग लगया। जिससे मनुष्य आत्मा के जीवन में अवगुण बुराई रूपी रंग मिट गया। और परमात्मा की याद के संग से आत्मा दिव्य गुणों से रंग गई। और मुख से सदैव ज्ञान के मधुर मीठे बोल, बोलते हैं। इसका यादगार होली में रंग लगाते और मुख मीठा कर है।
होली के त्यौहार में ,श्री कृष्ण और गोप गोपियों को रास-लीला और रंग खेलते हुए दिखाते हैं। क्योंकि इस संगम युग में साधारण रूप में आए हुए गोपी वल्लभ ,परमात्मा शिव मुरली का ज्ञान, हम गोप गोपियों को सुना कर आत्मा को संपूर्ण पावन बनते है और अतींद्रिय सुखों का रास कराते है। अपने जीवन से अवगुण बुराइयों को निकाल कर मनुष्य से देवता बनकर सुख शांति पवित्रता प्रेम की नई दुनिया में नए युग में राज्य देते है।
इसलिए यादगार में होली के बाद नये साल की शुरुआत दिखाते है।
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भारत में अनेक त्यौहार मनाए जाते हैं उनमें से 'होली' का पवित्र त्यौहार बहुत उमंग उत्साह और खुशियों से मनाया जाता है। उसमें होली जलाते , एक दूसरे से मंगल मिलन मनाते हुए मुंख मीठा करते हैं। एक दूसरे को रंग लगाते हुए होली मनाते है।
होली माना- हो गई। बीती सो बीती। और दूसरा होली माना- पवित्र। हमारे जीवन में कुछ ऐसी घटनाए और परिस्थितियां आती है।उनके चिंतन से हम स्वयं दुखी और परेशान रहते है। कई बार हमारे बातों से या व्यवहार से दूसरे लोग भी दुखी और परेशान होते है। इन पुरानी बातों को बीती सो बीती! माना बिंदी लगाकर स्टॉप करने से पुरानी बातों को भूल कर अच्छे,और शुभ भावना वाले श्रेष्ठ विचार मन में लाकर फिर से हम पुनः खुशियों से आनंद से जीवन जी सकते हैं।
होली रात्रि को जलाते हैं। इस कलयुग के अज्ञान रूपी अंधकार की रात्री में हम मनुष्य आत्माएं देह भान में आकर काम ,क्रोध, लोभ, मोह ,और अहंकार के वश होकर, कर्म कर रहे हैं इसलिए लड़ाई झगड़े, कर्मभोग और बीमारी के कारण मनुष्य जीवन दु:खी अशांत हो चुका है। ऐसे समय पर हम मनुष्य आत्माओं के पिता परमात्मा शिव, सृष्टि के रचयिता इस धरती पर आकर ! हमें आत्मा का और परमात्मा का सत्य परिचय देकर सृष्टि चक्र का ज्ञान देकर, राजयोग सिखलाते हैं।
योग अग्नि से हमारे अंदर कि बुराई और असुरी संस्कार भस्म कर परमात्मा पिता के साथ हम मंगल मिलन मनाते हैं। जिससे आत्मा पवित्र और शुद्ध बनने से खुशी, आनंद और सुख मिलता है। इसका यादगार होली जलाकर एक दूसरे से खुशियों से मिलन मनाते है।
होली जलाने के बाद रंग लगाते हैं। इस कलयुग में हम आत्मा यह शरीर रूपी वस्त्र के संग के कारण कर्मेंद्रियों के अधीन होकर कर्म करती है इसलिए मनुष्य आत्माएं दुखी और अशांत हो गए हैं। हम मनुष्य आत्माओं को परमात्मा पिता ने आकर ज्ञान का रंग आत्मा को लगाया जिससे आत्मा के अंदर पवित्रता, सुख, शांति ,प्रेम ,आनंद और शक्ति यह आत्मा के ओरिजिनल गुणों का, अविनाशी पक्का रंग लगया। जिससे मनुष्य आत्मा के जीवन में अवगुण बुराई रूपी रंग मिट गया। और परमात्मा की याद के संग से आत्मा दिव्य गुणों से रंग गई। और मुख से सदैव ज्ञान के मधुर मीठे बोल, बोलते हैं। इसका यादगार होली में रंग लगाते और मुख मीठा कर है।
होली के त्यौहार में ,श्री कृष्ण और गोप गोपियों को रास-लीला और रंग खेलते हुए दिखाते हैं। क्योंकि इस संगम युग में साधारण रूप में आए हुए गोपी वल्लभ ,परमात्मा शिव मुरली का ज्ञान, हम गोप गोपियों को सुना कर आत्मा को संपूर्ण पावन बनते है और अतींद्रिय सुखों का रास कराते है। अपने जीवन से अवगुण बुराइयों को निकाल कर मनुष्य से देवता बनकर सुख शांति पवित्रता प्रेम की नई दुनिया में नए युग में राज्य देते है।
इसलिए यादगार में होली के बाद नये साल की शुरुआत दिखाते है।
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होली स्पेशल राजस्थान इतिहास की क्लास अजय सर द्वारा आज शाम 7 बजे होगी।
VIDEO LINK:-https://youtu.be/HQVUhNV-SdY
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राजस्थान का इतिहास | चौहान वंश | rajasthan history | राजस्थान की सभी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण |
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30 मार्च के Test का शेड्यूल
ये Test 30 March शाम 4:00 बजे प्रारंभ होगा......
जिन भी विद्यार्थियों ने यह ... टेस्ट सीरीज नहीं ली है वह ले ले... यह टेस्ट सीरीज पूरे 5 महीने चलने वाली है.. इसमें आप का संपूर्ण पाठ्यक्रम बहुत अच्छे तरीके से कवर हो जाएगा
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प्रमुख नदियां एवं उनकी सहायक नदियां
═══════════════════════
❀【गंगा】
1. गोमती 2. घाघरा 3. गंडक 4. कोसी 5. यमुना 6. सोन 7. रामगन्गा
❀【यमुना】
1. चंबल 2. सिंध 3. बेतवा 4. केन 5. टोंस 6. हिन्डन
❀【गोदावरी】
1. इंद्रावती 2. मंजिरा 3. बिन्दुसार 4. सरबरी 5. पेनगंगा 6.प्राणहिता
❀【कृष्णा】
1. तुंगभद्रा 2. घटप्रभा 3. मालाप्रभा 4. भीम 5. वेदावती 6. कोयना
❀【कावेरी】
1. काबिनी 2. हेमावती 3.सिम्शा 4. अर्कावती 5. भवानी
❀【नर्मदा】
1. अमरावती 2. भुखी 3. तवा 4. बंगेर
❀【सिंधु】
1. सतलुज 2. द्रास 3. जांस्कर 4. श्योक 5.गिल्गिट 6. सुरु
❀【ब्रह्मपुत्र】
1. दिबांग 2. लोहित 3. जिया भोरेली (कामेंग) 4. दिखौव 5. सुबानसिरी मानस
❀【दामोदर】
1. बराकर 2. कोनार
❀【रवि】
1. बुधिल 2. नई या धोना 3. सिउल 4. ऊझ
❀【महानंदी】
1. सिवनाथ 2. हसदेव 3. जोंक 4. मंड 5. इब 6. ओंग 7. तेल
❀【चम्बल】
1. बानस 2. कालि सिंध 3. शीप्रा 4. पार्बती 5. मे
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═══════════════════════
❀【गंगा】
1. गोमती 2. घाघरा 3. गंडक 4. कोसी 5. यमुना 6. सोन 7. रामगन्गा
❀【यमुना】
1. चंबल 2. सिंध 3. बेतवा 4. केन 5. टोंस 6. हिन्डन
❀【गोदावरी】
1. इंद्रावती 2. मंजिरा 3. बिन्दुसार 4. सरबरी 5. पेनगंगा 6.प्राणहिता
❀【कृष्णा】
1. तुंगभद्रा 2. घटप्रभा 3. मालाप्रभा 4. भीम 5. वेदावती 6. कोयना
❀【कावेरी】
1. काबिनी 2. हेमावती 3.सिम्शा 4. अर्कावती 5. भवानी
❀【नर्मदा】
1. अमरावती 2. भुखी 3. तवा 4. बंगेर
❀【सिंधु】
1. सतलुज 2. द्रास 3. जांस्कर 4. श्योक 5.गिल्गिट 6. सुरु
❀【ब्रह्मपुत्र】
1. दिबांग 2. लोहित 3. जिया भोरेली (कामेंग) 4. दिखौव 5. सुबानसिरी मानस
❀【दामोदर】
1. बराकर 2. कोनार
❀【रवि】
1. बुधिल 2. नई या धोना 3. सिउल 4. ऊझ
❀【महानंदी】
1. सिवनाथ 2. हसदेव 3. जोंक 4. मंड 5. इब 6. ओंग 7. तेल
❀【चम्बल】
1. बानस 2. कालि सिंध 3. शीप्रा 4. पार्बती 5. मे
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