हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि के तौर पर किसे नियुक्त किया गया?
@Taiyari_karlo
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Anonymous Quiz
50%
रुचिरा कंबोज
50%
केके वेणुगोपाल
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current by gajanand sir 016.06.2022.pdf
19.4 MB
CLASS LINK:- https://youtu.be/lmTBk1tSNtU
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भरतपुर नगर(Bharatpur city)
सामान्य परिचय
भरतपुर शहर की बात की जाए तो इसकी स्थापना
जाट शासक राजा सूरजमल ने की थी और यह अपनेसमय में जाटों का गढ़ हुआ करता था। यहाँ के मंदिर,
महल व किले जाटों के कला कौशल की गवाही देते हैं।
राष्ट्रीय उद्यान के अलावा भी देखने के लिए यहाँ अनेक
जगह हैं
नामकरण
इसका नामकरण राम के भाई भरत के नाम पर किया गया है। लक्ष्मण इस राज परिवार के कुलदेव माने गये हैं। इसके पूर्व यह जगह सोगडिया जाट सरदार रुस्तम के अधिकार में था जिसको महाराजा सूरजमल ने जीता और 1733 में भरतपुर नगर की नींव डाली।
भरतपुर नाम से यह एक स्वतंत्र राज्य भी था।महाराजा सूरजमल के समय भरतपुर राज्य की सीमा आगरा, धोलपुर, मैनपुरी, हाथरस, अलीगढ़, इटावा, मेरठ, रोहतक, फर्रुखनगर, मेवात, रेवाड़ी, गुरुग्राम (गुड़गाँव), तथा मथुरा तक के विस्तृत भू-भाग पर फैली हुई थी।
मुख्य आकर्षण
➡️भरतपुर राष्ट्रीय उद्यान
भरतपुर राष्ट्रीय उद्यान केवलादेव घना के नाम से भी जाना जाता है। केवलादेव नाम भगवान शिव को समर्पित मंदिर से लिया गया है जो इस उद्यान के बीच में स्थित है। घना नाम घने वनों की ओर संकेत करता है जो एक समय इस उद्यान को घेरे हुए था। यहाँ करीब ३७५ प्रजातियों के पक्षी पाये जाते हैं जिनमें यहाँ रहने वाले और प्रवासी पक्षी शामिल हैं। यहाँ भारत के अन्य भागों से तो पक्षी आते ही हैं साथ ही यूरोप, साइबेरिया, चीन, तिब्बत आदि जगहों से भी प्रवासी पक्षी आते हैं। पक्षियों के अलावा साम्भर, चीतल, नीलगाय आदि पशु भी यहाँ पाये जाते हैं।
➡️गंगा महारानी मंदिर⛪️
यह मंदिर शहर का सबसे सुंदर मंदिर है। वास्तुकला की राजपूत, मुगल और दक्षिण भारतीय शैली का खूबसूरत मिश्रण गंगा महारानी मंदिर का निर्माण भरतपुर के शासक महाराजा बलवंत सिंह ने करवाया था। मंदिर की दीवारों और खम्भों पर की गयी बारीक और सुंदर नक्काशी दर्शनीय है। मंदिर को पूरा होने में 91 वर्ष समय लगा। यहाँ पूरे देश तथा विदेशों से हजारों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। केवल श्रद्धा की दृष्टि से ही नहीं बल्कि अपने अद्भुत वास्तुशिल्प के कारण भी यह मंदिर लोगों को आकर्षित करता है। देवी गंगा की मूर्ति के अलावा भरतपुर के इस मंदिर में मगरमच्छ की एक विशाल मूर्ति है जिन्हें देवी गंगा का वाहन भी माना जाता है। हर साल भक्त हरिद्वार से गंगाजल लाकर देवी के चरणों के पास रखे विशाल रजत पात्र में डालते हैं। माना जाता है कि जब देवी गंगा अपना दिव्य आशीर्वाद इस जल में डालती है तब यह जल भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में बाँट दिया जाता है।
➡️बाँके बिहारी मंदिर⛪️
बाँके बिहारी मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। माना जाता है कि यहाँ भगवान कृष्ण भक्तों की सभी आकांक्षाओं को पूरा करते हैं। भरतपुर का बाँके बिहारी मंदिर भारत के उन मंदिरों में से एक है जहाँ हमेशा सैकड़ों लोगों की भीड़ लगी रहती है। आरती से पहले भगवान की प्रतिमा को वस्त्र और आभूषणों से सजाया जाता है। मुख्य कक्ष के बाहर बरामदे की दीवारों पर भगवान कृष्ण के बचपन को दर्शाते चित्र देखे जा सकते हैं। मंदिर की दीवारों और छतों पर अनेक देवी-देवताओं की सुंदर तस्वीरें बनायी गयी हैं।
सामान्य परिचय
भरतपुर शहर की बात की जाए तो इसकी स्थापना
जाट शासक राजा सूरजमल ने की थी और यह अपनेसमय में जाटों का गढ़ हुआ करता था। यहाँ के मंदिर,
महल व किले जाटों के कला कौशल की गवाही देते हैं।
राष्ट्रीय उद्यान के अलावा भी देखने के लिए यहाँ अनेक
जगह हैं
नामकरण
इसका नामकरण राम के भाई भरत के नाम पर किया गया है। लक्ष्मण इस राज परिवार के कुलदेव माने गये हैं। इसके पूर्व यह जगह सोगडिया जाट सरदार रुस्तम के अधिकार में था जिसको महाराजा सूरजमल ने जीता और 1733 में भरतपुर नगर की नींव डाली।
भरतपुर नाम से यह एक स्वतंत्र राज्य भी था।महाराजा सूरजमल के समय भरतपुर राज्य की सीमा आगरा, धोलपुर, मैनपुरी, हाथरस, अलीगढ़, इटावा, मेरठ, रोहतक, फर्रुखनगर, मेवात, रेवाड़ी, गुरुग्राम (गुड़गाँव), तथा मथुरा तक के विस्तृत भू-भाग पर फैली हुई थी।
मुख्य आकर्षण
➡️भरतपुर राष्ट्रीय उद्यान
भरतपुर राष्ट्रीय उद्यान केवलादेव घना के नाम से भी जाना जाता है। केवलादेव नाम भगवान शिव को समर्पित मंदिर से लिया गया है जो इस उद्यान के बीच में स्थित है। घना नाम घने वनों की ओर संकेत करता है जो एक समय इस उद्यान को घेरे हुए था। यहाँ करीब ३७५ प्रजातियों के पक्षी पाये जाते हैं जिनमें यहाँ रहने वाले और प्रवासी पक्षी शामिल हैं। यहाँ भारत के अन्य भागों से तो पक्षी आते ही हैं साथ ही यूरोप, साइबेरिया, चीन, तिब्बत आदि जगहों से भी प्रवासी पक्षी आते हैं। पक्षियों के अलावा साम्भर, चीतल, नीलगाय आदि पशु भी यहाँ पाये जाते हैं।
➡️गंगा महारानी मंदिर⛪️
यह मंदिर शहर का सबसे सुंदर मंदिर है। वास्तुकला की राजपूत, मुगल और दक्षिण भारतीय शैली का खूबसूरत मिश्रण गंगा महारानी मंदिर का निर्माण भरतपुर के शासक महाराजा बलवंत सिंह ने करवाया था। मंदिर की दीवारों और खम्भों पर की गयी बारीक और सुंदर नक्काशी दर्शनीय है। मंदिर को पूरा होने में 91 वर्ष समय लगा। यहाँ पूरे देश तथा विदेशों से हजारों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। केवल श्रद्धा की दृष्टि से ही नहीं बल्कि अपने अद्भुत वास्तुशिल्प के कारण भी यह मंदिर लोगों को आकर्षित करता है। देवी गंगा की मूर्ति के अलावा भरतपुर के इस मंदिर में मगरमच्छ की एक विशाल मूर्ति है जिन्हें देवी गंगा का वाहन भी माना जाता है। हर साल भक्त हरिद्वार से गंगाजल लाकर देवी के चरणों के पास रखे विशाल रजत पात्र में डालते हैं। माना जाता है कि जब देवी गंगा अपना दिव्य आशीर्वाद इस जल में डालती है तब यह जल भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में बाँट दिया जाता है।
➡️बाँके बिहारी मंदिर⛪️
बाँके बिहारी मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। माना जाता है कि यहाँ भगवान कृष्ण भक्तों की सभी आकांक्षाओं को पूरा करते हैं। भरतपुर का बाँके बिहारी मंदिर भारत के उन मंदिरों में से एक है जहाँ हमेशा सैकड़ों लोगों की भीड़ लगी रहती है। आरती से पहले भगवान की प्रतिमा को वस्त्र और आभूषणों से सजाया जाता है। मुख्य कक्ष के बाहर बरामदे की दीवारों पर भगवान कृष्ण के बचपन को दर्शाते चित्र देखे जा सकते हैं। मंदिर की दीवारों और छतों पर अनेक देवी-देवताओं की सुंदर तस्वीरें बनायी गयी हैं।
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➡️लक्ष्मण मंदिर⛪️
लक्ष्मण मंदिर का निर्माण महाराजा बलवंत सिंह ने 1870 में करवाया था। उनके पिता महाराजा बलदेव सिंह श्री संत दास के सम्पर्क में आये और तब उन्होंने इस मंदिर की नींव रखी। श्री संत दास लक्ष्मण जी के भक्त थे और जीवनपर्यंत उनके प्रति समर्पित रहे। इस मंदिर की नींव रखने के बाद महाराजा बलदेव सिंह ने बलवंत सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। मंदिर को पूरा कराने का श्रेय महाराजा बलवंत सिंह को जाता है।
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में लक्ष्मण जी और उर्मिला जी की प्रतिमाएँ स्थापित हैं, इनके अलावा राम, भरत, शत्रुघ्न तथा हनुमान जी की छोटी मूर्तियाँ भी यहाँ देखे जा सकते हैं। ये सभी प्रतिमाएँ अष्टधातु से बनी हैं। यह मंदिर पत्थरों पर की गयी खूबसूरत नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।
➡️लोहागढ़ किला
महाराजा सूरजमल ने एक अभेद्य किले की परिकल्पना की थी, जिसके अन्तर्गत शर्त यह थी कि पैसा भी कम लगे और मजबूती में बेमिशाल हो। राजा साहब ने इस विषय पर मंत्रियों, दरबारियों तथा विद्वतजनों से गहन विचार-विमर्श किया, तत्कालीन युद्ध के साधनों एवम् उनकी मारक क्षमता का ध्यान रखते हुए किला बनाने का निर्णय लिया गया, जिसके फलस्वरूप किले के दोनों तरफ मजबूत दरवाजे जिनमें नुकीले लोहे की सलाखें लगायी गयी। उस समय तोपों तथा बारुद का प्रचलन अत्यधिक था, जिससे किलों की मजबूत से मजबूत दीवारों को आसानी से ढहाया जा सकता था। इसलिए पहले किले की चौड़ी-चौड़ी मजबूत पत्थर की ऊँची-ऊँची प्राचीरें बनायी गयी, अब इन पर तोपों के गोलों का असर नहीं हो इसके लिए इन दीवारों के चारों ओर सैकड़ों फुट चौड़ी कच्ची मिट्टी की दीवार बनायी गयी और नीचे सैकड़ों फुट गहरी और चौड़ी खाई बनाकर उसमें पानी भरा गया, जिससे दुश्मन के द्वारा तोपों के गोले दीवारों पर दागने के बाद वो मिट्टी मे धँसकर दम तोड़ दे और अगर नीचे की ओर प्रहार करे तो पानी मे शान्त हो जाए और पानी को पार कर सपाट दीवार पर चढ़ना तो मुश्किल ही नहीं असम्भव था। मुश्किल वक्त में किले के दरवाजों को बन्द करके सैनिक सिर्फ पक्की दीवारों के पीछे और दरवाजों पर मोर्चा लेकर पूरे किले को आसानी से अभेद्य बना लेते थे। जिस किले में लेशमात्र भी लोहा नहीं लगा और अपनी अभेद्यता के बल पर लोहगढ़ कहलाया। जिसने समय-समय पर दुश्मनों के दाँत खट्टे किये और अपना लोहा मनवाने में शत्रु को मजबूर किया। ऐसे थे भरतपुर के दूरदर्शी राजा। लोहागढ़ किले का निर्माण 18वीं शताब्दी के आरम्भ में जाट शासक महाराजा सूरजमल ने करवाया था। यह किला भरतपुर के जाट शासकों की हिम्मत और शौर्य का प्रतीक है। अपनी सुरक्षा प्रणाली के कारण यह किला लोहागढ़ के नाम से जाना गया। किले के चारों ओर गहरी खाई हैं जो इसे सुरक्षा प्रदान करती है। यद्यपि लोहागढ़ किला इस क्षेत्र के अन्य किलों के समान वैभवशाली नहीं है लेकिन इसकी ताकत और भव्यता अद्भुत है। किले के अन्दर महत्त्वपूर्ण स्थान हैं— किशोरी महल, महल खास, मोती महल और कोठी खास। सूरजमल ने मुगलों और अंग्रेजों पर अपनी जीत की याद में किले के अन्दर जवाहर बुर्ज और फतेह बुर्ज बनवाये। यहाँ अष्टधातु से निर्मित एक द्वार भी है जिसमें हाथियों के विशाल चित्र बने हुए हैं।
दर्शन स्थल
➡️डीग के महल
भरतपुर से 34 कि॰मी॰ उत्तर में डीग नामक बागों का खूबसूरत नगर है। शहर के मुख्य आकर्षणों में मनमोहक उद्यान, सुन्दर फव्वारा और भव्य जलमहल शामिल है। यह शहर बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। डीग के राजमहलों में निर्मित गोपाल भवन का निर्माण सन् 1780 में किया गया था। खूबसूरत बागीचों से सजे इस भवन से गोपाल सागर का अद्भुत नजारा देखा जा सकता है। भवन के दोनों ओर दो छोटी इमारतें हैं, जिन्हें सावन भवन और भादो भवन के नाम से पुकारा जाता है।
➡️डीग का किला
भरतपुर के आसपास घूमना तब तक अधूरा है जब तक डीग किला नहीं देख लिया जाता। राजा सूरजमल ने इस किले का निर्माण कुछ ऊँचाई पर करवाया था। किले का मुख्य आकर्षण यहाँ की घड़ी मिनार है, जहाँ से न केवल पूरे महल को देखा जा सकता है बल्कि नीचे शहरों का नजारा भी लिया जा सकता है। इसके ऊपर एक बंदूक रखी है जो आगरा किले से यहाँ लायी गयी थी। खाई, ऊँची दीवारों और द्वारों से घिरे इस किले के अवशेष मात्र ही देखे जा सकते हैं।
लक्ष्मण मंदिर का निर्माण महाराजा बलवंत सिंह ने 1870 में करवाया था। उनके पिता महाराजा बलदेव सिंह श्री संत दास के सम्पर्क में आये और तब उन्होंने इस मंदिर की नींव रखी। श्री संत दास लक्ष्मण जी के भक्त थे और जीवनपर्यंत उनके प्रति समर्पित रहे। इस मंदिर की नींव रखने के बाद महाराजा बलदेव सिंह ने बलवंत सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। मंदिर को पूरा कराने का श्रेय महाराजा बलवंत सिंह को जाता है।
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में लक्ष्मण जी और उर्मिला जी की प्रतिमाएँ स्थापित हैं, इनके अलावा राम, भरत, शत्रुघ्न तथा हनुमान जी की छोटी मूर्तियाँ भी यहाँ देखे जा सकते हैं। ये सभी प्रतिमाएँ अष्टधातु से बनी हैं। यह मंदिर पत्थरों पर की गयी खूबसूरत नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।
➡️लोहागढ़ किला
महाराजा सूरजमल ने एक अभेद्य किले की परिकल्पना की थी, जिसके अन्तर्गत शर्त यह थी कि पैसा भी कम लगे और मजबूती में बेमिशाल हो। राजा साहब ने इस विषय पर मंत्रियों, दरबारियों तथा विद्वतजनों से गहन विचार-विमर्श किया, तत्कालीन युद्ध के साधनों एवम् उनकी मारक क्षमता का ध्यान रखते हुए किला बनाने का निर्णय लिया गया, जिसके फलस्वरूप किले के दोनों तरफ मजबूत दरवाजे जिनमें नुकीले लोहे की सलाखें लगायी गयी। उस समय तोपों तथा बारुद का प्रचलन अत्यधिक था, जिससे किलों की मजबूत से मजबूत दीवारों को आसानी से ढहाया जा सकता था। इसलिए पहले किले की चौड़ी-चौड़ी मजबूत पत्थर की ऊँची-ऊँची प्राचीरें बनायी गयी, अब इन पर तोपों के गोलों का असर नहीं हो इसके लिए इन दीवारों के चारों ओर सैकड़ों फुट चौड़ी कच्ची मिट्टी की दीवार बनायी गयी और नीचे सैकड़ों फुट गहरी और चौड़ी खाई बनाकर उसमें पानी भरा गया, जिससे दुश्मन के द्वारा तोपों के गोले दीवारों पर दागने के बाद वो मिट्टी मे धँसकर दम तोड़ दे और अगर नीचे की ओर प्रहार करे तो पानी मे शान्त हो जाए और पानी को पार कर सपाट दीवार पर चढ़ना तो मुश्किल ही नहीं असम्भव था। मुश्किल वक्त में किले के दरवाजों को बन्द करके सैनिक सिर्फ पक्की दीवारों के पीछे और दरवाजों पर मोर्चा लेकर पूरे किले को आसानी से अभेद्य बना लेते थे। जिस किले में लेशमात्र भी लोहा नहीं लगा और अपनी अभेद्यता के बल पर लोहगढ़ कहलाया। जिसने समय-समय पर दुश्मनों के दाँत खट्टे किये और अपना लोहा मनवाने में शत्रु को मजबूर किया। ऐसे थे भरतपुर के दूरदर्शी राजा। लोहागढ़ किले का निर्माण 18वीं शताब्दी के आरम्भ में जाट शासक महाराजा सूरजमल ने करवाया था। यह किला भरतपुर के जाट शासकों की हिम्मत और शौर्य का प्रतीक है। अपनी सुरक्षा प्रणाली के कारण यह किला लोहागढ़ के नाम से जाना गया। किले के चारों ओर गहरी खाई हैं जो इसे सुरक्षा प्रदान करती है। यद्यपि लोहागढ़ किला इस क्षेत्र के अन्य किलों के समान वैभवशाली नहीं है लेकिन इसकी ताकत और भव्यता अद्भुत है। किले के अन्दर महत्त्वपूर्ण स्थान हैं— किशोरी महल, महल खास, मोती महल और कोठी खास। सूरजमल ने मुगलों और अंग्रेजों पर अपनी जीत की याद में किले के अन्दर जवाहर बुर्ज और फतेह बुर्ज बनवाये। यहाँ अष्टधातु से निर्मित एक द्वार भी है जिसमें हाथियों के विशाल चित्र बने हुए हैं।
दर्शन स्थल
➡️डीग के महल
भरतपुर से 34 कि॰मी॰ उत्तर में डीग नामक बागों का खूबसूरत नगर है। शहर के मुख्य आकर्षणों में मनमोहक उद्यान, सुन्दर फव्वारा और भव्य जलमहल शामिल है। यह शहर बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। डीग के राजमहलों में निर्मित गोपाल भवन का निर्माण सन् 1780 में किया गया था। खूबसूरत बागीचों से सजे इस भवन से गोपाल सागर का अद्भुत नजारा देखा जा सकता है। भवन के दोनों ओर दो छोटी इमारतें हैं, जिन्हें सावन भवन और भादो भवन के नाम से पुकारा जाता है।
➡️डीग का किला
भरतपुर के आसपास घूमना तब तक अधूरा है जब तक डीग किला नहीं देख लिया जाता। राजा सूरजमल ने इस किले का निर्माण कुछ ऊँचाई पर करवाया था। किले का मुख्य आकर्षण यहाँ की घड़ी मिनार है, जहाँ से न केवल पूरे महल को देखा जा सकता है बल्कि नीचे शहरों का नजारा भी लिया जा सकता है। इसके ऊपर एक बंदूक रखी है जो आगरा किले से यहाँ लायी गयी थी। खाई, ऊँची दीवारों और द्वारों से घिरे इस किले के अवशेष मात्र ही देखे जा सकते हैं।
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लोकोक्तियाँ
1. अक्ल बडी कि भैस (शारीरिक बल से बौद्धिक बल अधिक अच्छा होता है।)
किसान लोग पहले मेहनत तो खूब करते थे पर अनाज कम पैदा होता था। अब उन्नत बीज और खाद से अच्छी फसल लेने लगे हैं। सच ही कहा कि अक्ल बड़ी कि भैंस ।
1. अक्ल बडी कि भैस (शारीरिक बल से बौद्धिक बल अधिक अच्छा होता है।)
किसान लोग पहले मेहनत तो खूब करते थे पर अनाज कम पैदा होता था। अब उन्नत बीज और खाद से अच्छी फसल लेने लगे हैं। सच ही कहा कि अक्ल बड़ी कि भैंस ।
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लोकोक्ति
2. अक्ल का अंधा/ अक्ल का दुश्मन होना (महामूर्ख होना)
दुनिया में सभी तरह के लोग हैं। अक्लवान हैं तो अक्ल के अंधे भी बहुत हैं । (UPPCS-98)
2. अक्ल का अंधा/ अक्ल का दुश्मन होना (महामूर्ख होना)
दुनिया में सभी तरह के लोग हैं। अक्लवान हैं तो अक्ल के अंधे भी बहुत हैं । (UPPCS-98)
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लोकोक्ति
3. अटका बनिया देय उधार (स्वार्थी और मजबूर व्यक्ति अनचाहा कार्य भी करता है) कारखाने में श्रमिकों की हड़ताल हो जाने के कारण कारखाना मालिक अकुशल श्रमिकों को भी दुगुनी-तिगुनी मज़दूरी पर रख रहा है। क्या करे, अटका बनिया देय उधार ।
3. अटका बनिया देय उधार (स्वार्थी और मजबूर व्यक्ति अनचाहा कार्य भी करता है) कारखाने में श्रमिकों की हड़ताल हो जाने के कारण कारखाना मालिक अकुशल श्रमिकों को भी दुगुनी-तिगुनी मज़दूरी पर रख रहा है। क्या करे, अटका बनिया देय उधार ।
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बीकानेर का किला{जूनागढ़ का किला}-Fort of Bikaner (Fort of Junagadh)
निर्माण का परिचय
बीकानेर के पुराने गढ़ की नींव बीकानेर के
संस्थापक राव बीकाजी ने करणी माता के आशीर्वाद से सन 1485 ई. में रखी थी जिसे
बीकाजी की टेकरी कहते हैं उसी जगह इस
जूनागढ़ का निर्माण राय सिंह ने सन् 1588 ई.
फाल्गुन सुधि 12 से सन् 1593 ई. तक करवाया
| इसीलिए इसे जूनागढ़ का किला कहते हैं|
किले का आकार
किले की समचौरस सफील दीवार है
पूर्व की दीवार 401 गज
दक्षिण की दीवार 403 गज
पश्चिम की दीवार 407 गज
उत्तर की दीवार 406
को्ट की सफील 19 गज ऊँची| महलायत के नीचे ओसार 20 गज और 10 गज कोट व परकोटे के नीचे है | परकोटे के बाहर खाई 20 गज जोड़ी है तथा 25 गज गहरी है इस तरह गढ़ का निर्माण करवाया गया|
दुर्ग के प्रवेश द्वार
इस दुर्ग के पूर्वी दरवाजे का नामकरण बोल पश्चिम दरवाजे का नाम चांदपोल इन दो मुख्य दरवाजों के अलावा इसमें पांच आंतरिक द्वार है जो दौलतपोल फतेहपोल रतनपोल सूरजपोल तथा ध्रुव पोल है
दुर्ग के ऐतिहासिक एवं दर्शनीय स्थल
अनूप महल-
इसका निर्माण महाराजा अनूपसिंह ने करवाया था इस महिला के सोने की कलम से काम किया हुआ है यहीं पर बीकानेर के राजाओं का राजतिलक होता था|
लालगढ़ महल-
इसका निर्माण महाराजा गंगा सिंह ने अपने पिता लाल सिंह की स्मृति में लाल पत्थरों से करवाया था|
फूल महल व गज मंदिर-
यह दोनों महल शीशे की बारीक कटाई और फूल पत्तियों के संजीव चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है|
कर्ण महल-
इस का निर्माण महाराजा अनूप सिंह ने अपने पिता करण सिंह की स्मृति में करवाया था|
छत्र निवास-
इसमें सुंदर लकड़ी की छत और कृष्ण की रासलीला के संजीव चित्रण के कारण दर्शनीय है
हरमंदिर-
यहां पर राजकीय विवाह गणगौर व अन्य उत्सवों का आयोजन किया जाता है
घंटाघर-
इसका निर्माण महाराजा डूंगर सिंह ने करवाया था रामसर व रानी सर दुर्ग में जल पीने हेतु हत्था जलराशि वाले कुए है
सुर सागर-
इस झील का निर्माण सुर सिंह ने करवाया था| इस झील का वसुंधरा राजे ने जीर्णोध्दार करवाकर 15 अगस्त 2008 को इसमें नौकायन का उद्घाटन किया|इस दुर्ग में 33 करोड़ देवी देवता मंदिर है जिसमें हेरंब गणपति{ सिंह पर सवार गणपति} की दुर्लभ प्रतिमा स्थित है एवं यहां बने संग्रहालय में 1000 वर्ष पुरानी सरस्वती की प्रतिमा दर्शनीय है|
किले की विशेषताएं
यह दुर्ग राती घाटी नामक चट्टान पर बना हुआ है अत: इस दुर्ग को राती घाटी का किला कहते हैं दयालदास की ख्यात में लिखा है कि नए गढ की नीव मौजूदा पुराने गढ़ के स्थान पर ही भरी गई थी इसी कारण से जूनागढ़ का जाता है
यह दुर्ग ‘धान्वन दुर्ग’ व भूमि दुर्ग की श्रेणी में आता है
इस ग्रुप को जमीन का जेवर नाम से भी जाना जाता है
यह दुर्ग चतुष्कोणीय या चतुर्भुजाकृति में बना हुआ है!
राजस्थान में पहली बार इस ग्रुप में लिफ्ट बनाई गई!
इस दुर्ग का निर्माण हिंदू और मुस्लिम शैली के समन्वय से हुआ है !
इस दुर्ग के बारे में कहते हैं दीवारों के कान होते हैं पर जूनागढ़ के महलों की दीवारें बोलती है |
इस दुर्ग में एक भी साका नहीं हुआ|
आमेर व बीकानेर दो ऐसे किले है जो जिस वंश के द्वारा बनाए गए थे हमेशा उसी वंश के अधिकार में रहे|
निर्माण का परिचय
बीकानेर के पुराने गढ़ की नींव बीकानेर के
संस्थापक राव बीकाजी ने करणी माता के आशीर्वाद से सन 1485 ई. में रखी थी जिसे
बीकाजी की टेकरी कहते हैं उसी जगह इस
जूनागढ़ का निर्माण राय सिंह ने सन् 1588 ई.
फाल्गुन सुधि 12 से सन् 1593 ई. तक करवाया
| इसीलिए इसे जूनागढ़ का किला कहते हैं|
किले का आकार
किले की समचौरस सफील दीवार है
पूर्व की दीवार 401 गज
दक्षिण की दीवार 403 गज
पश्चिम की दीवार 407 गज
उत्तर की दीवार 406
को्ट की सफील 19 गज ऊँची| महलायत के नीचे ओसार 20 गज और 10 गज कोट व परकोटे के नीचे है | परकोटे के बाहर खाई 20 गज जोड़ी है तथा 25 गज गहरी है इस तरह गढ़ का निर्माण करवाया गया|
दुर्ग के प्रवेश द्वार
इस दुर्ग के पूर्वी दरवाजे का नामकरण बोल पश्चिम दरवाजे का नाम चांदपोल इन दो मुख्य दरवाजों के अलावा इसमें पांच आंतरिक द्वार है जो दौलतपोल फतेहपोल रतनपोल सूरजपोल तथा ध्रुव पोल है
दुर्ग के ऐतिहासिक एवं दर्शनीय स्थल
अनूप महल-
इसका निर्माण महाराजा अनूपसिंह ने करवाया था इस महिला के सोने की कलम से काम किया हुआ है यहीं पर बीकानेर के राजाओं का राजतिलक होता था|
लालगढ़ महल-
इसका निर्माण महाराजा गंगा सिंह ने अपने पिता लाल सिंह की स्मृति में लाल पत्थरों से करवाया था|
फूल महल व गज मंदिर-
यह दोनों महल शीशे की बारीक कटाई और फूल पत्तियों के संजीव चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है|
कर्ण महल-
इस का निर्माण महाराजा अनूप सिंह ने अपने पिता करण सिंह की स्मृति में करवाया था|
छत्र निवास-
इसमें सुंदर लकड़ी की छत और कृष्ण की रासलीला के संजीव चित्रण के कारण दर्शनीय है
हरमंदिर-
यहां पर राजकीय विवाह गणगौर व अन्य उत्सवों का आयोजन किया जाता है
घंटाघर-
इसका निर्माण महाराजा डूंगर सिंह ने करवाया था रामसर व रानी सर दुर्ग में जल पीने हेतु हत्था जलराशि वाले कुए है
सुर सागर-
इस झील का निर्माण सुर सिंह ने करवाया था| इस झील का वसुंधरा राजे ने जीर्णोध्दार करवाकर 15 अगस्त 2008 को इसमें नौकायन का उद्घाटन किया|इस दुर्ग में 33 करोड़ देवी देवता मंदिर है जिसमें हेरंब गणपति{ सिंह पर सवार गणपति} की दुर्लभ प्रतिमा स्थित है एवं यहां बने संग्रहालय में 1000 वर्ष पुरानी सरस्वती की प्रतिमा दर्शनीय है|
किले की विशेषताएं
यह दुर्ग राती घाटी नामक चट्टान पर बना हुआ है अत: इस दुर्ग को राती घाटी का किला कहते हैं दयालदास की ख्यात में लिखा है कि नए गढ की नीव मौजूदा पुराने गढ़ के स्थान पर ही भरी गई थी इसी कारण से जूनागढ़ का जाता है
यह दुर्ग ‘धान्वन दुर्ग’ व भूमि दुर्ग की श्रेणी में आता है
इस ग्रुप को जमीन का जेवर नाम से भी जाना जाता है
यह दुर्ग चतुष्कोणीय या चतुर्भुजाकृति में बना हुआ है!
राजस्थान में पहली बार इस ग्रुप में लिफ्ट बनाई गई!
इस दुर्ग का निर्माण हिंदू और मुस्लिम शैली के समन्वय से हुआ है !
इस दुर्ग के बारे में कहते हैं दीवारों के कान होते हैं पर जूनागढ़ के महलों की दीवारें बोलती है |
इस दुर्ग में एक भी साका नहीं हुआ|
आमेर व बीकानेर दो ऐसे किले है जो जिस वंश के द्वारा बनाए गए थे हमेशा उसी वंश के अधिकार में रहे|
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राजस्थान की छतरियां(Rajasthan ki chatriya)
1. गैटोर की छतरियां
नाहरगढ़ (जयपुर) में स्थित है।
ये कछवाहा शासको की छतरियां है।
जयसिंह द्वितीय से मानसिंह द्वितीय की छतरियां है।
2. बड़ा बाग की छतरियां
जैसलमेर में स्थित है।
यहां भाटी शासकों की छतरियां स्थित है।
3. क्षारबाग की छतरियां
कोटा में स्थित है।
यहां हाड़ा शासकों की छतरियां स्थित है।
4. देवकुण्ड की छतरियां
रिड़मलसर (बीकानेर) में स्थित है।
राव बीकाजी व रायसिंह की छतरियां प्रसिद्ध है।
5. छात्र विलास की छतरी
कोटा में स्थित है।
6. केसर बाग की छतरी
बूंदी में स्थित है।
7. जसवंत थड़ा
जोधपुर में स्थित है।
सरदार सिंह द्वारा निर्मित है।
8. रैदास की छतरी
चित्तौड़गढ में स्थित है।
9. गोपाल सिंह यादव की छतरी
करौली में स्थित है।
10. 08 खम्भों की छतरी
बांडोली (उदयपुर) में स्थित है।
यह वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की छतरी है।
11. 32 खम्भो की छतरी राजस्थान में दो स्थानों पर 32-32 खम्भों की छतरियां है।मांडल गढ (भीलवाड़ा) में स्थित 32 खम्भों की छतरी का संबंध जगन्नाथ कच्छवाहासे है।रणथम्भौर (सवाई माधोपुर) में स्थित 32 खम्भों की छतरी हम्मीर देव चैहानकी छतरी है।
12. 80 खम्भों की छतरी अलवर में स्थित हैंयह छतरी मूसी महारानी से संबंधित है।
13. 84 खम्भों की छतरी बूंदी में स्थित है।यह छतरी राजा अनिरूद के माता देव की छतरी है।यह छतरी भगवान शिव को समर्पित है।
14. 16 खम्भों की छतरी नागौर में स्थित हैंयह अमर सिंह की छतरी है। ये राठौड वंशीय थे।
15. टंहला की छतरीयां अलवर में स्थित हैं।
16. आहड़ की छतरियां उदयपुर में स्थित हैंइन्हे महासतियां भी कहते है।
17. राजा बख्तावर सिंह की छतरी अलवर में स्थित है।
18. राजा जोधसिंह की छतरी बदनौर (भीलवाडा) में स्थित है।
19. मानसिंह प्रथम की छतरी आमेर (जयपुर) में स्थित है।
20. 06 खम्भों की छतरी लालसौट (दौसा) में स्थित है।
21. गोराधाय की छतरी जोधपुर में स्थित हैं।अजीत सिंह की धाय मां की छतरी है।
1. गैटोर की छतरियां
नाहरगढ़ (जयपुर) में स्थित है।
ये कछवाहा शासको की छतरियां है।
जयसिंह द्वितीय से मानसिंह द्वितीय की छतरियां है।
2. बड़ा बाग की छतरियां
जैसलमेर में स्थित है।
यहां भाटी शासकों की छतरियां स्थित है।
3. क्षारबाग की छतरियां
कोटा में स्थित है।
यहां हाड़ा शासकों की छतरियां स्थित है।
4. देवकुण्ड की छतरियां
रिड़मलसर (बीकानेर) में स्थित है।
राव बीकाजी व रायसिंह की छतरियां प्रसिद्ध है।
5. छात्र विलास की छतरी
कोटा में स्थित है।
6. केसर बाग की छतरी
बूंदी में स्थित है।
7. जसवंत थड़ा
जोधपुर में स्थित है।
सरदार सिंह द्वारा निर्मित है।
8. रैदास की छतरी
चित्तौड़गढ में स्थित है।
9. गोपाल सिंह यादव की छतरी
करौली में स्थित है।
10. 08 खम्भों की छतरी
बांडोली (उदयपुर) में स्थित है।
यह वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की छतरी है।
11. 32 खम्भो की छतरी राजस्थान में दो स्थानों पर 32-32 खम्भों की छतरियां है।मांडल गढ (भीलवाड़ा) में स्थित 32 खम्भों की छतरी का संबंध जगन्नाथ कच्छवाहासे है।रणथम्भौर (सवाई माधोपुर) में स्थित 32 खम्भों की छतरी हम्मीर देव चैहानकी छतरी है।
12. 80 खम्भों की छतरी अलवर में स्थित हैंयह छतरी मूसी महारानी से संबंधित है।
13. 84 खम्भों की छतरी बूंदी में स्थित है।यह छतरी राजा अनिरूद के माता देव की छतरी है।यह छतरी भगवान शिव को समर्पित है।
14. 16 खम्भों की छतरी नागौर में स्थित हैंयह अमर सिंह की छतरी है। ये राठौड वंशीय थे।
15. टंहला की छतरीयां अलवर में स्थित हैं।
16. आहड़ की छतरियां उदयपुर में स्थित हैंइन्हे महासतियां भी कहते है।
17. राजा बख्तावर सिंह की छतरी अलवर में स्थित है।
18. राजा जोधसिंह की छतरी बदनौर (भीलवाडा) में स्थित है।
19. मानसिंह प्रथम की छतरी आमेर (जयपुर) में स्थित है।
20. 06 खम्भों की छतरी लालसौट (दौसा) में स्थित है।
21. गोराधाय की छतरी जोधपुर में स्थित हैं।अजीत सिंह की धाय मां की छतरी है।
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RRB NTPC में पूछे गए प्रश्न -
👉पाँचवें आम चुनाव के बाद भारत के पीएम कौन
बने
उत्तर-1971 में इंदिरा गांधी -
👉कांग्रेस पार्टी द्वारा 'गरीबी हटाओं' नारा कौन-से
लोकसभा चुनाव में प्रमुख था
उत्तर - पांचवें 1971
👉प्रथम लोकसभा के चुनाव किस वर्ष हुए -
उत्तर-1951-52 में -
भारत में नई आर्थिक नीति कब अपनाई गई
उत्तर-1991 में
👉भारत में नई आर्थिक नीति किसके काल में अपनाई गई
उत्तर-पी. वी. नरसिम्हा राव
👉रूस में साम्यवादी क्रांति कब हुई -
उत्तर-1917 में
👉अर्थशास्त्र में स्थिर ऊपरी लागत का क्या अर्थ होता है
उत्तर- माँग के साथ न बदलने वाली लागत
👉राष्ट्रीय आय की गणना में नहीं माना जाता है
उत्तर - महिला द्वारा घरेलू कार्य -
👉भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद विधेयक
की परिभाषा देता है
उत्तर- अनुच्छेद 110 -
👉इलाहाबाद का पुराना नाम क्या था
उत्तर-प्रयागराज -
👉दिल्ली के किस सुल्तान ने कुछ-कुछ आज की
कागजी मुद्रा की तरह 'टोकन मुद्रा' किसने चलाई थी
उत्तर - मुहम्मद बिन तुगलक
👉बंगाल का विभाजन किस वर्ष रद्द कर दिया गया था
उत्तर-1911 में
👉मध्यकालीन भारत में 'जामदानी' बुनाई का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र कौन-सा था
उत्तर - ढाका (बांग्लादेश)
👉पाँचवें आम चुनाव के बाद भारत के पीएम कौन
बने
उत्तर-1971 में इंदिरा गांधी -
👉कांग्रेस पार्टी द्वारा 'गरीबी हटाओं' नारा कौन-से
लोकसभा चुनाव में प्रमुख था
उत्तर - पांचवें 1971
👉प्रथम लोकसभा के चुनाव किस वर्ष हुए -
उत्तर-1951-52 में -
भारत में नई आर्थिक नीति कब अपनाई गई
उत्तर-1991 में
👉भारत में नई आर्थिक नीति किसके काल में अपनाई गई
उत्तर-पी. वी. नरसिम्हा राव
👉रूस में साम्यवादी क्रांति कब हुई -
उत्तर-1917 में
👉अर्थशास्त्र में स्थिर ऊपरी लागत का क्या अर्थ होता है
उत्तर- माँग के साथ न बदलने वाली लागत
👉राष्ट्रीय आय की गणना में नहीं माना जाता है
उत्तर - महिला द्वारा घरेलू कार्य -
👉भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद विधेयक
की परिभाषा देता है
उत्तर- अनुच्छेद 110 -
👉इलाहाबाद का पुराना नाम क्या था
उत्तर-प्रयागराज -
👉दिल्ली के किस सुल्तान ने कुछ-कुछ आज की
कागजी मुद्रा की तरह 'टोकन मुद्रा' किसने चलाई थी
उत्तर - मुहम्मद बिन तुगलक
👉बंगाल का विभाजन किस वर्ष रद्द कर दिया गया था
उत्तर-1911 में
👉मध्यकालीन भारत में 'जामदानी' बुनाई का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र कौन-सा था
उत्तर - ढाका (बांग्लादेश)
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