रात का वक्त भी कितना अजीब होता है,
पास न होकर भी कोई दिल के करीब होता है।
रात होते ही सारी यादें चली आती हैं,
पलकों पर पुरानी बातें उतर जाती हैं।
दिल की दहलीज़ पर खामोशी का साया होता हैं,
पुराने जख्मों का पहरा नजर आने लगता हैं।
कोई शोर नहीं होता पर दर्द बोलता है,
तन्हाई में हर राज़ अपने आप खुलता है।
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पास न होकर भी कोई दिल के करीब होता है।
रात होते ही सारी यादें चली आती हैं,
पलकों पर पुरानी बातें उतर जाती हैं।
दिल की दहलीज़ पर खामोशी का साया होता हैं,
पुराने जख्मों का पहरा नजर आने लगता हैं।
कोई शोर नहीं होता पर दर्द बोलता है,
तन्हाई में हर राज़ अपने आप खुलता है।
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कहने वाले बहुत थे,ज़रूरत पड़े तो याद करना,
मगर जब सच में ज़रूरत पड़ी,
तो खामोशी के सिवा कुछ हाथ नहीं आया।
हमने तो हर किसी के दर्द को अपना समझा था,
शायद इसी वजह से अपना दर्द
किसी को बता ही नहीं पाए।
अब किसी से शिकायत नहीं करते,
बस इतना समझ गए हैं,
हर अपना, ज़रूरत के वक़्त अपना नहीं होता।
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मगर जब सच में ज़रूरत पड़ी,
तो खामोशी के सिवा कुछ हाथ नहीं आया।
हमने तो हर किसी के दर्द को अपना समझा था,
शायद इसी वजह से अपना दर्द
किसी को बता ही नहीं पाए।
अब किसी से शिकायत नहीं करते,
बस इतना समझ गए हैं,
हर अपना, ज़रूरत के वक़्त अपना नहीं होता।
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कुछ लफ़्ज़ दिल में उतर गए,
कुछ ज़ख़्म दिल में ठहर गए,
वो मुझे क्या-क्या कहकर चला गया,
और हम ख़ामोश होकर बिखर गए।
कभी लगता था ये दर्द मिट जाए,
कभी लगता था ये दिल थम जाए,
मौत की दुआ भी माँगी कई बार,
मगर ज़िंदगी हर बार रुक जाए।
अब समझ आया इस दर्द के बाद,
हर अँधेरी रात के बाद सवेरा आता है,
जिसने मुझे तोड़ने की कोशिश की,
वही दर्द मुझे खुद से मिलाता है।
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कुछ ज़ख़्म दिल में ठहर गए,
वो मुझे क्या-क्या कहकर चला गया,
और हम ख़ामोश होकर बिखर गए।
कभी लगता था ये दर्द मिट जाए,
कभी लगता था ये दिल थम जाए,
मौत की दुआ भी माँगी कई बार,
मगर ज़िंदगी हर बार रुक जाए।
अब समझ आया इस दर्द के बाद,
हर अँधेरी रात के बाद सवेरा आता है,
जिसने मुझे तोड़ने की कोशिश की,
वही दर्द मुझे खुद से मिलाता है।
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सच-सच कहो,
क्या सच में ईश्वर है?
अगर है,
तो ये जाति-व्यवस्था क्यों?
अगर सभी ब्रह्मा के अंश हैं,
फिर ये शूद्र और अछूत क्यों?
अब यह तर्क मत देना कि
ब्रह्मा के पैर भी अछूत हैं।
सच बताओ…
जब सभी मनु-श्रद्धा के वंशज हैं,
तो तुम्हें विभिन्न धर्मों से बैर क्यों?
ये मत कहना कि उनका धर्म अलग है,
क्योंकि इंसान वो भी है,
तुम भी हो।
बताओ…
क्या सच में ईश्वर है?
फिर अपने हक़ के लिए मरने वाला
केवल इंसान ही क्यों?
ईश्वर क्यों नहीं?
ये तर्क मत देना कि
कलियुग है...
ईश्वर भी नियमों में जकड़ा हुआ है।
बताओ…
अगर वह है,तो फिर...
शोषण, गरीबी, लाचारी, भुखमरी,
शोक, रोग, अत्याचार, अपराध, मृत्यु
क्यों है?
इसके लिए कोई कथा मत सुनाना,
कोई झूठा तर्क मत बताना।
मुझे लगता है,
ईश्वर कुछ नहीं....
केवल तुम्हारी कल्पना है,
जिसका प्रयोग तुम
सांत्वना देने
या शोषण करने के लिए करते हो।
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4 sep 2026
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क्या सच में ईश्वर है?
अगर है,
तो ये जाति-व्यवस्था क्यों?
अगर सभी ब्रह्मा के अंश हैं,
फिर ये शूद्र और अछूत क्यों?
अब यह तर्क मत देना कि
ब्रह्मा के पैर भी अछूत हैं।
सच बताओ…
जब सभी मनु-श्रद्धा के वंशज हैं,
तो तुम्हें विभिन्न धर्मों से बैर क्यों?
ये मत कहना कि उनका धर्म अलग है,
क्योंकि इंसान वो भी है,
तुम भी हो।
बताओ…
क्या सच में ईश्वर है?
फिर अपने हक़ के लिए मरने वाला
केवल इंसान ही क्यों?
ईश्वर क्यों नहीं?
ये तर्क मत देना कि
कलियुग है...
ईश्वर भी नियमों में जकड़ा हुआ है।
बताओ…
अगर वह है,तो फिर...
शोषण, गरीबी, लाचारी, भुखमरी,
शोक, रोग, अत्याचार, अपराध, मृत्यु
क्यों है?
इसके लिए कोई कथा मत सुनाना,
कोई झूठा तर्क मत बताना।
मुझे लगता है,
ईश्वर कुछ नहीं....
केवल तुम्हारी कल्पना है,
जिसका प्रयोग तुम
सांत्वना देने
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4 sep 2026
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प्रिय रोहित वेमुला,
जब तुमने कहा था
प्रशासन को...
एडमिशन के समय,
सभी दलित छात्रों को
ज़हर और रस्सी मुहैया कराई जाएँ,
तब,
मुझे लगा था...
जो तुम्हारे साथ हुआ, वह
दोबारा कभी नहीं होगा
और ये समाज,
छात्रों की प्रतिभा देखेगा,
न कि उनकी जाति।
खैर, मैं ग़लत साबित हुई...
आज जब,
साहिल वाकोडे की आत्महत्या पर
उसकी प्रतिभा से पहले...
उसकी जाति देखी गई
और मरणोपरांत
उसे अपशब्द कहे गए,
तब मुझे लगता है कि
तुमने सही कहा था...
अम्बेडकर को पढ़ने से पहले
दलित छात्रों को
ज़हर साथ रखना चाहिए।
अब, मुझे डर लगता है
अम्बेडकर और पेरियार को पढ़ने से
और दया आती है दलित छात्रों पर,
जिनका जन्म और मृत्यु दोनों
अभिशाप जैसे हैं।
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22 sep 2026
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जब तुमने कहा था
प्रशासन को...
एडमिशन के समय,
सभी दलित छात्रों को
ज़हर और रस्सी मुहैया कराई जाएँ,
तब,
मुझे लगा था...
जो तुम्हारे साथ हुआ, वह
दोबारा कभी नहीं होगा
और ये समाज,
छात्रों की प्रतिभा देखेगा,
न कि उनकी जाति।
खैर, मैं ग़लत साबित हुई...
आज जब,
साहिल वाकोडे की आत्महत्या पर
उसकी प्रतिभा से पहले...
उसकी जाति देखी गई
और मरणोपरांत
उसे अपशब्द कहे गए,
तब मुझे लगता है कि
तुमने सही कहा था...
अम्बेडकर को पढ़ने से पहले
दलित छात्रों को
ज़हर साथ रखना चाहिए।
अब, मुझे डर लगता है
अम्बेडकर और पेरियार को पढ़ने से
और दया आती है दलित छात्रों पर,
जिनका जन्म और मृत्यु दोनों
अभिशाप जैसे हैं।
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22 sep 2026
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जो कल तक कहते थे, तुम जैसी इंसान मिल जाए,
आज वही हर इल्जाम का खंजर दिल पर चलाए।
प्यार न कबूला तो कसूरवार बना दिया,
चरित्र पर हमारे जाने क्या-क्या सवाल उठा दिया।
कहते हैं पत्थर दिल हैं हम, मक्कार और झूठे हैं,
देख नहीं पाए वो कि अंदर से हम कितने टूटे हैं।
गलती क्या थी मेरी, बस यही न कि भरोसा किया?
खुद को सही साबित करने में, अपनों को खो दिया।
अब जीने की ख्वाहिश भी नहीं, न मौत से डर लगता है,
इस मतलबी दुनिया में हर शख्स बेगाना लगता है।
चलो मान लिया, शायद हम ही गलत और नासमझ थे,
पर सच तो यह है कि ये लोग कभी अपने थे ही नहीं।
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आज वही हर इल्जाम का खंजर दिल पर चलाए।
प्यार न कबूला तो कसूरवार बना दिया,
चरित्र पर हमारे जाने क्या-क्या सवाल उठा दिया।
कहते हैं पत्थर दिल हैं हम, मक्कार और झूठे हैं,
देख नहीं पाए वो कि अंदर से हम कितने टूटे हैं।
गलती क्या थी मेरी, बस यही न कि भरोसा किया?
खुद को सही साबित करने में, अपनों को खो दिया।
अब जीने की ख्वाहिश भी नहीं, न मौत से डर लगता है,
इस मतलबी दुनिया में हर शख्स बेगाना लगता है।
चलो मान लिया, शायद हम ही गलत और नासमझ थे,
पर सच तो यह है कि ये लोग कभी अपने थे ही नहीं।
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SC/ST Act बनाया गया था
सुरक्षा, भेदभाव और अत्याचार
रोकने के लिए।
इसका उद्देश्य केवल
समानता है।
मगर,
कुछ लोग इसे ख़ैरात समझते हैं,
आपसी बैर का हथियार समझते हैं।
वे समझते हैं कि
इसके इस्तेमाल से
वे दुनिया को झुका देंगे,
और करते हैं Act का दुरुपयोग।
और,
उन कुछ लोगों की वजह से
बेवजह परेशान होते हैं
मासूम लोग और असली पीड़ित,
बेवजह बढ़ते हैं
अदालतों के मामले।
मुझे लगता है,
जो लोग कहते हैं..
“हम पर सदियों से अत्याचार हुआ है,”
और फिर करते हैं
"ऐसा तुच्छ काम",
उन्हें भी मिलना चाहिए
कानून के अनुसार वही दंड,
जो दिया जाता है
एक "जातिवादी" को।
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24 sep 2026
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सुरक्षा, भेदभाव और अत्याचार
रोकने के लिए।
इसका उद्देश्य केवल
समानता है।
मगर,
कुछ लोग इसे ख़ैरात समझते हैं,
आपसी बैर का हथियार समझते हैं।
वे समझते हैं कि
इसके इस्तेमाल से
वे दुनिया को झुका देंगे,
और करते हैं Act का दुरुपयोग।
और,
उन कुछ लोगों की वजह से
बेवजह परेशान होते हैं
मासूम लोग और असली पीड़ित,
बेवजह बढ़ते हैं
अदालतों के मामले।
मुझे लगता है,
जो लोग कहते हैं..
“हम पर सदियों से अत्याचार हुआ है,”
और फिर करते हैं
"ऐसा तुच्छ काम",
उन्हें भी मिलना चाहिए
कानून के अनुसार वही दंड,
जो दिया जाता है
एक "जातिवादी" को।
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कुछ ज़ख्म ऐसे हैं, जो कभी भर नहीं पाते, कुछ दर्द ऐसे हैं, जो किसी से कह नहीं पाते।
हँसते हुए भी दिल में एक दर्द रहता है, चेहरे पर सुकून, पर मन बेचैन रहता है।
मौत का नाम सुनकर अब डर नहीं लगता, जब दिल ही उदास हो, तो कुछ अच्छा नहीं लगता।
कभी सोचती हूँ, ये दर्द कहीं खो जाए, दिल पर रखा हर बोझ धीरे-धीरे मिट जाए।
मौत गले से लगाए और सुकून मिल जाए, इस दुनिया की उलझनों से ये मन मुक्त हो जाए।
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हँसते हुए भी दिल में एक दर्द रहता है, चेहरे पर सुकून, पर मन बेचैन रहता है।
मौत का नाम सुनकर अब डर नहीं लगता, जब दिल ही उदास हो, तो कुछ अच्छा नहीं लगता।
कभी सोचती हूँ, ये दर्द कहीं खो जाए, दिल पर रखा हर बोझ धीरे-धीरे मिट जाए।
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अगर कभी मेरी याद आए, तो मेरी बचकानी बातें याद करना,
मेरे पागलपन, मेरी ज़िद और मेरा बेवजह रूठना याद करना।
मेरी छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होना याद करना,
मेरे लड़ने के अंदाज़ में छिपे अपनापन को याद करना।
शायद मैं बुरी थी, शायद मुझसे गलतियाँ हुई होंगी,
शायद मेरी वजह से किसी की आँखें भी नम हुई होंगी।
पर कभी मेरे दिल का हाल भी समझने की कोशिश करना,
मेरी हँसी के पीछे छिपे दर्द को भी महसूस करना।
मैं जैसी थी, वैसी कभी किसी ने जाना ही नहीं,
मेरे दिल में क्या था, यह किसी ने पहचाना ही नहीं।
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मेरे पागलपन, मेरी ज़िद और मेरा बेवजह रूठना याद करना।
मेरी छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होना याद करना,
मेरे लड़ने के अंदाज़ में छिपे अपनापन को याद करना।
शायद मैं बुरी थी, शायद मुझसे गलतियाँ हुई होंगी,
शायद मेरी वजह से किसी की आँखें भी नम हुई होंगी।
पर कभी मेरे दिल का हाल भी समझने की कोशिश करना,
मेरी हँसी के पीछे छिपे दर्द को भी महसूस करना।
मैं जैसी थी, वैसी कभी किसी ने जाना ही नहीं,
मेरे दिल में क्या था, यह किसी ने पहचाना ही नहीं।
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मैं हर किसी की ख़ास हूँ, ऐसा ज़रूरी तो नहीं,
हर कोई मुझे ख़ास बताए, मेरा अपना हो, ज़रूरी तो नहीं।
तलाशती है नज़रें जिसे, वो हर चेहरा हो जाए अपना,
हर महफ़िल में कोई हमसफ़र बन जाए, ज़रूरी तो नहीं।
ज़रा सी बात पर किसी के, आँखें जो भर आती हैं,
हर शख़्स मेरी इन आहों को समझे, ज़रूरी तो नहीं।
कागज़ पर उतर आते हैं, दर्द जो दिल में पलते हैं,
हर पढ़ने वाला इन लफ़्ज़ों को जाने, ज़रूरी तो नहीं।
भीड़ में तन्हाई का ये मंज़र जो सहती हूँ,
हर शख्स मेरा दर्द पहचाने, ज़रूरी तो नहीं।
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हर कोई मुझे ख़ास बताए, मेरा अपना हो, ज़रूरी तो नहीं।
तलाशती है नज़रें जिसे, वो हर चेहरा हो जाए अपना,
हर महफ़िल में कोई हमसफ़र बन जाए, ज़रूरी तो नहीं।
ज़रा सी बात पर किसी के, आँखें जो भर आती हैं,
हर शख़्स मेरी इन आहों को समझे, ज़रूरी तो नहीं।
कागज़ पर उतर आते हैं, दर्द जो दिल में पलते हैं,
हर पढ़ने वाला इन लफ़्ज़ों को जाने, ज़रूरी तो नहीं।
भीड़ में तन्हाई का ये मंज़र जो सहती हूँ,
हर शख्स मेरा दर्द पहचाने, ज़रूरी तो नहीं।
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