दर्द के पतझड में...
पतझड़ में उसका दिल टूटा है
दिल टूटा है पतझड़ में उसका
उसकी आवाज़ साफ-साफ सुनाई दे रही हैं
उसका दर्द, उसका दर्द अश्कों का रास्ता ढूंढ रहा हैं
आखों में जिसकी चाहत की तस्वीर थी
उस चाहत का पता सदियों से खोज रहा है
तन्हाई की लकीरें पतझड़ में दर्द की चिट्ठी पढ़ रही हैं
नैनो में अश्रू का एकाकी पतझड़ दर्द की बरसात बनकर बरसे जा रहा है
सूखे पत्तों की आवाज़ को बार-बार दिल से
दर्द की सुबह में दोहरा रहा है
कोई सुने या ना सुने
कोई प्रश्न कोई उत्तर नहीं
उसकी सिसकियाँ उसकी चाहत
लापता हो गई सूखे पत्तों की सरसराहट में
एक दर्द का शोर
उसके शब्दों में…
उसकी बातों का असर
दिल के ज़र्रे ज़र्रे में …
अश्क, आसू, नीर
एक ही दवा उसके दर्द के तूफ़ानों के …
दर्द के पतझड में...
#anil
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पतझड़ में उसका दिल टूटा है
दिल टूटा है पतझड़ में उसका
उसकी आवाज़ साफ-साफ सुनाई दे रही हैं
उसका दर्द, उसका दर्द अश्कों का रास्ता ढूंढ रहा हैं
आखों में जिसकी चाहत की तस्वीर थी
उस चाहत का पता सदियों से खोज रहा है
तन्हाई की लकीरें पतझड़ में दर्द की चिट्ठी पढ़ रही हैं
नैनो में अश्रू का एकाकी पतझड़ दर्द की बरसात बनकर बरसे जा रहा है
सूखे पत्तों की आवाज़ को बार-बार दिल से
दर्द की सुबह में दोहरा रहा है
कोई सुने या ना सुने
कोई प्रश्न कोई उत्तर नहीं
उसकी सिसकियाँ उसकी चाहत
लापता हो गई सूखे पत्तों की सरसराहट में
एक दर्द का शोर
उसके शब्दों में…
उसकी बातों का असर
दिल के ज़र्रे ज़र्रे में …
अश्क, आसू, नीर
एक ही दवा उसके दर्द के तूफ़ानों के …
दर्द के पतझड में...
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घर से दूर
अपना घर था, फिर भी किराए के कमरे में रहना पड़ा,
रोटी की खातिर अपनों से दूर रहना पड़ा।
जिस आँगन में बचपन हँसता था कभी,
उसी आँगन को अब तस्वीरों में देखना पड़ा।
माँ की आवाज़ सुनकर भी गले लग न सके,
बाप की खामोशी पढ़कर भी पास आ न सके।
रिश्ते तो सारे आज भी वहीं हैं मेरे,
बस रोज़गार के लिए हम उनके साथ रह न सके।
लोग कहते हैं— “तुम तो अपने पैरों पर खड़े हो गए,”
कोई ये नहीं पूछता कि कितनी रातें रोकर बड़े हो गए।
एक छोटी-सी नौकरी के लिए क्या-क्या छोड़ आए,
सुकून, नींद, त्योहार… और घर की वो शामें छोड़ आए।
कमरा छोटा है, मगर ख़्वाब बहुत बड़े हैं,
हम घर से दूर हैं… क्योंकि घर के लिए ही खड़े हैं।
कभी लौटेंगे तो शायद सब वैसा ही होगा,
माँ की वही दुआएँ, पिता का वही साया होगा…
बस हम थोड़े बदल चुके होंगे—
क्योंकि अपना घर छोड़कर कमाना,
सिर्फ़ पैसे कमाना नहीं…
ख़ुद को हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा खोना होता है।
#arjunthakur
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अपना घर था, फिर भी किराए के कमरे में रहना पड़ा,
रोटी की खातिर अपनों से दूर रहना पड़ा।
जिस आँगन में बचपन हँसता था कभी,
उसी आँगन को अब तस्वीरों में देखना पड़ा।
माँ की आवाज़ सुनकर भी गले लग न सके,
बाप की खामोशी पढ़कर भी पास आ न सके।
रिश्ते तो सारे आज भी वहीं हैं मेरे,
बस रोज़गार के लिए हम उनके साथ रह न सके।
लोग कहते हैं— “तुम तो अपने पैरों पर खड़े हो गए,”
कोई ये नहीं पूछता कि कितनी रातें रोकर बड़े हो गए।
एक छोटी-सी नौकरी के लिए क्या-क्या छोड़ आए,
सुकून, नींद, त्योहार… और घर की वो शामें छोड़ आए।
कमरा छोटा है, मगर ख़्वाब बहुत बड़े हैं,
हम घर से दूर हैं… क्योंकि घर के लिए ही खड़े हैं।
कभी लौटेंगे तो शायद सब वैसा ही होगा,
माँ की वही दुआएँ, पिता का वही साया होगा…
बस हम थोड़े बदल चुके होंगे—
क्योंकि अपना घर छोड़कर कमाना,
सिर्फ़ पैसे कमाना नहीं…
ख़ुद को हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा खोना होता है।
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मन बेचैन है बहुत,
न जाने क्या होने को है,
ख़ामोश है ये रात मगर,
दिल कुछ कहने को है।
बेवजह आँखों में नमी है,
बेवजह दिल घबराता है,
सब कुछ तो ठीक है फिर भी,
कुछ अच्छा नहीं लगता है।
न कोई ख़बर बुरी आई,
न कोई अपना दूर हुआ,
फिर क्यों ये दिल आज इतना,
ख़ुद से ही मजबूर हुआ।
शायद कोई अनहोनी नहीं,
बस अपनों की याद सताती है,
दूर रहकर कमाने वालों को,
हर ख़ामोशी डराती है।
मन बेचैन है बहुत,
न जाने क्या होने को है…
शायद दिल को घर की याद आई है,
या कोई अपना बहुत याद आने को है।
#arjunthakur
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न जाने क्या होने को है,
ख़ामोश है ये रात मगर,
दिल कुछ कहने को है।
बेवजह आँखों में नमी है,
बेवजह दिल घबराता है,
सब कुछ तो ठीक है फिर भी,
कुछ अच्छा नहीं लगता है।
न कोई ख़बर बुरी आई,
न कोई अपना दूर हुआ,
फिर क्यों ये दिल आज इतना,
ख़ुद से ही मजबूर हुआ।
शायद कोई अनहोनी नहीं,
बस अपनों की याद सताती है,
दूर रहकर कमाने वालों को,
हर ख़ामोशी डराती है।
मन बेचैन है बहुत,
न जाने क्या होने को है…
शायद दिल को घर की याद आई है,
या कोई अपना बहुत याद आने को है।
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एक तो तुम,
जो ख़ुद शायरी हो,
ऊपर से तुम्हारी
शायरियाँ...
तुम्हारा ये अंदाज़
नाजायज़ है,
मेरे क़त्ल के
तरीक़े और भी हैं।।
#Bhagyashree
#review
5 September 2026
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जो ख़ुद शायरी हो,
ऊपर से तुम्हारी
शायरियाँ...
तुम्हारा ये अंदाज़
नाजायज़ है,
मेरे क़त्ल के
तरीक़े और भी हैं।।
#Bhagyashree
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5 September 2026
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हां मैं सुंदर नहीं हूं और न ही हूं कोई धनी
मैं तो बस एक टूटा और बिखरा हुआ सच हूं
मुझे किसी से कोई सौदा नहीं करना होता
मैं तो बस जाने अनजाने, इसमें फंस जाता हूं
मैं कम हूं, ज्यादा हूं, जो हूं, जैसा हूं अपना हूं
देखो मुझे, मैं कहां चल रहा,
मैं तो बस चलवाया जा रहा हूं...
29/09/2026
✍#RajashreePatra
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मैं तो बस एक टूटा और बिखरा हुआ सच हूं
मुझे किसी से कोई सौदा नहीं करना होता
मैं तो बस जाने अनजाने, इसमें फंस जाता हूं
मैं कम हूं, ज्यादा हूं, जो हूं, जैसा हूं अपना हूं
देखो मुझे, मैं कहां चल रहा,
मैं तो बस चलवाया जा रहा हूं...
29/09/2026
✍#RajashreePatra
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तुम्हारा शुक्रिया, लड़कों,
तुम भीड़ में होकर भी भीड़ जैसे नहीं,
तुम समाज में रहकर भी समाज जैसे नहीं।
तुम्हारे हाथों में किताबें थीं,
तुम्हारी आँखों में बदलाव के ख़्वाब थे,
तुम भी उसी समाज का हिस्सा थे,
मगर तुम्हारे सवाल रूढ़ियों के ख़िलाफ़ थे।
तुम लीक से हटकर चले,
तुमने पुरानी परिपाटियों को ललकारा,
तुमने अपने भीतर के पुरुष को नहीं,
अपने भीतर के इंसान को सँवारा।
तुम बने राजा राम मोहन राय
दयानंद सरस्वती,अम्बेडकर
तुम्हारे विचारों में फूले और
अब्दुल कलाम बसते है
तुम्हारा शुक्रिया, लड़कों,
तुमने विरासत में मिली सोच
को अंतिम सत्य नहीं माना...
तुम्हारी रहमतों का असर है कि
लड़कियां घर से बाहर निकली है
वो तुमसे स्त्री होने के मायने समझी है
वो बेबाक बेफिक्री से सच को कहती हैं
वो तुमसे सीखकर तुम्हारी राह चलती है
तुम्हारा शुक्रिया, लड़कों,
कि तुमने मर्द होने से पहले इंसान होना चुना।
#Bhagyashree
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तुम भीड़ में होकर भी भीड़ जैसे नहीं,
तुम समाज में रहकर भी समाज जैसे नहीं।
तुम्हारे हाथों में किताबें थीं,
तुम्हारी आँखों में बदलाव के ख़्वाब थे,
तुम भी उसी समाज का हिस्सा थे,
मगर तुम्हारे सवाल रूढ़ियों के ख़िलाफ़ थे।
तुम लीक से हटकर चले,
तुमने पुरानी परिपाटियों को ललकारा,
तुमने अपने भीतर के पुरुष को नहीं,
अपने भीतर के इंसान को सँवारा।
तुम बने राजा राम मोहन राय
दयानंद सरस्वती,अम्बेडकर
तुम्हारे विचारों में फूले और
अब्दुल कलाम बसते है
तुम्हारा शुक्रिया, लड़कों,
तुमने विरासत में मिली सोच
को अंतिम सत्य नहीं माना...
तुम्हारी रहमतों का असर है कि
लड़कियां घर से बाहर निकली है
वो तुमसे स्त्री होने के मायने समझी है
वो बेबाक बेफिक्री से सच को कहती हैं
वो तुमसे सीखकर तुम्हारी राह चलती है
तुम्हारा शुक्रिया, लड़कों,
कि तुमने मर्द होने से पहले इंसान होना चुना।
#Bhagyashree
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जब तक पहनोगे ना पायल,
घुँघरुओं की रुनझुन कहाँ समझ पाओगे।
जब तक जेठ में घूँघट कर घूमोगे नहीं,
गर्मी का दंश कहाँ समझ पाओगे।
तुमको सारे मौसम प्यारे,
सारे लोग और जहान भी प्यारे।
तुम फूलकुँवर हो इस बगिया के,
तुमने केवल तितलियाँ देखीं।
मगर तुम्हारी बातें मुझको
लगती हैं केवल किताबी।
काश कि तुम भी होते नारी,
फिर समझते व्यथा हमारी।
तुम यूँ न कभी भी होते ऐसे,
और न कहते बातें किताबी।
आख़िर,
बिन नारी का जीवन जिएं,
तुम कहाँ से नारी समझ पाओगे?
कवि, प्रेमी, योद्धा तो बन जाओगे..
मगर नारी के नयन कहा पढ़ पाओगे..
#Bhagyashree
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घुँघरुओं की रुनझुन कहाँ समझ पाओगे।
जब तक जेठ में घूँघट कर घूमोगे नहीं,
गर्मी का दंश कहाँ समझ पाओगे।
तुमको सारे मौसम प्यारे,
सारे लोग और जहान भी प्यारे।
तुम फूलकुँवर हो इस बगिया के,
तुमने केवल तितलियाँ देखीं।
मगर तुम्हारी बातें मुझको
लगती हैं केवल किताबी।
काश कि तुम भी होते नारी,
फिर समझते व्यथा हमारी।
तुम यूँ न कभी भी होते ऐसे,
और न कहते बातें किताबी।
आख़िर,
बिन नारी का जीवन जिएं,
तुम कहाँ से नारी समझ पाओगे?
कवि, प्रेमी, योद्धा तो बन जाओगे..
मगर नारी के नयन कहा पढ़ पाओगे..
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नारी केवल श्रद्धा क्यों ?
केवल श्रद्धा ही क्यों रहे वह ?
क्यों बने
सदा सेवा और त्याग की मूर्ति ?
अपनी मुस्कान को
क्यों समर्पित करे
स्वार्थी, कुत्सित साँपों के संधिपत्रों में ?
क्या अपने सपनों का दान ही सच्चा आदर्श है ?
उसे देवी-पद पर प्रतिष्ठित कर,
क्या हमने दी
उसे देवियों-सी स्वच्छंदता ?
उसे देवी का दर्जा देने में
क्या नहीं छिपा है हमारा आसुरी स्वार्थ ?
क्या वह बस एक बहाना नहीं है,
उसे सामाजिकता में जकड़कर
उसका निरंतर शोषण करने का
और करते ही रहने का...
और उसे पता ही न चले
कि सेवा और त्याग की चादर तले
उसने क्या कुछ खो दिया...
हमने उसे आसमान की देवी बना दिया
ताकि ज़मीन पर वह अपने हिस्से की ज़मीन न माँग सके।
घर की चारदीवारी को समतल भूमि कहकर,
हिंसा और प्रताड़ना के कुचक्र में फँसाकर,
क्या हमने छोड़ा उसे
दुर्गा या काली-सा विद्रोह करने लायक ?
उसे पीयूष-स्रोत तो कह दिया हमने,
पर क्या उसे बहने दिया—
नदी-सी, अपना पथ स्वयं चुनते हुए ?
वस्तु की तरह उसका उपभोग करके
देवी-पद पर प्रतिष्ठित कर,
क्या हमने उसे मनुष्य रहने दिया है ?
-पुनीत लाल साहू
#punitlalsahu
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केवल श्रद्धा ही क्यों रहे वह ?
क्यों बने
सदा सेवा और त्याग की मूर्ति ?
अपनी मुस्कान को
क्यों समर्पित करे
स्वार्थी, कुत्सित साँपों के संधिपत्रों में ?
क्या अपने सपनों का दान ही सच्चा आदर्श है ?
उसे देवी-पद पर प्रतिष्ठित कर,
क्या हमने दी
उसे देवियों-सी स्वच्छंदता ?
उसे देवी का दर्जा देने में
क्या नहीं छिपा है हमारा आसुरी स्वार्थ ?
क्या वह बस एक बहाना नहीं है,
उसे सामाजिकता में जकड़कर
उसका निरंतर शोषण करने का
और करते ही रहने का...
और उसे पता ही न चले
कि सेवा और त्याग की चादर तले
उसने क्या कुछ खो दिया...
हमने उसे आसमान की देवी बना दिया
ताकि ज़मीन पर वह अपने हिस्से की ज़मीन न माँग सके।
घर की चारदीवारी को समतल भूमि कहकर,
हिंसा और प्रताड़ना के कुचक्र में फँसाकर,
क्या हमने छोड़ा उसे
दुर्गा या काली-सा विद्रोह करने लायक ?
उसे पीयूष-स्रोत तो कह दिया हमने,
पर क्या उसे बहने दिया—
नदी-सी, अपना पथ स्वयं चुनते हुए ?
वस्तु की तरह उसका उपभोग करके
देवी-पद पर प्रतिष्ठित कर,
क्या हमने उसे मनुष्य रहने दिया है ?
-पुनीत लाल साहू
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गम की कोई वज़ह नहीं
जब आस-पास महक रहा है,
खामोश सुकून का एहसास
तड़पते वादियों में से
जब आ रही है मोहब्बत की पुकार
तो गम की कोई वज़ह नहीं
बनावटी आसुओं की बातें
कहनी में अब और नहीं
बर्फ की तरह जम गए हैं
वो ग़म, वो दर्द के लम्हें
उन्हें अब और अश्कों से पिघलाना नहीं
हक़ीक़त के परों में,
झूठे भ्रम की अब और उड़ान नहीं
घुटन की धूप धीरे-धीरे ढल रही है
तो, गम की कोई वज़ह नहीं
सवालों का भंवर समेट लो अब
हँसते जुगनुओं ने सीधे दिल पर दस्तक दी
गम की कोई वज़ह नहीं, कोई कारण नहीं
मिटते जा रहे हैं गम के ग़मगीन निशाँ
उम्मीद की साहिल पर इसको और रोको नहीं
जब कोई पुराना ज़ख्म दिल की धडकन में
रहता ही नहीं
तो उसे दूर तक सफ़र करने की जरूरत नहीं
अब जो बादलों ने बताया है
गम का कुछ कहना नहीं
तो इसे और सहलाने की जरूरत नहीं
दिल कोरे काग़ज़ ने गहरी चोट खाई है
उसे और झूठ के अश्कों से वाकिफ करना नहीं
गम की कोई वज़ह नहीं
#anil
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जब आस-पास महक रहा है,
खामोश सुकून का एहसास
तड़पते वादियों में से
जब आ रही है मोहब्बत की पुकार
तो गम की कोई वज़ह नहीं
बनावटी आसुओं की बातें
कहनी में अब और नहीं
बर्फ की तरह जम गए हैं
वो ग़म, वो दर्द के लम्हें
उन्हें अब और अश्कों से पिघलाना नहीं
हक़ीक़त के परों में,
झूठे भ्रम की अब और उड़ान नहीं
घुटन की धूप धीरे-धीरे ढल रही है
तो, गम की कोई वज़ह नहीं
सवालों का भंवर समेट लो अब
हँसते जुगनुओं ने सीधे दिल पर दस्तक दी
गम की कोई वज़ह नहीं, कोई कारण नहीं
मिटते जा रहे हैं गम के ग़मगीन निशाँ
उम्मीद की साहिल पर इसको और रोको नहीं
जब कोई पुराना ज़ख्म दिल की धडकन में
रहता ही नहीं
तो उसे दूर तक सफ़र करने की जरूरत नहीं
अब जो बादलों ने बताया है
गम का कुछ कहना नहीं
तो इसे और सहलाने की जरूरत नहीं
दिल कोरे काग़ज़ ने गहरी चोट खाई है
उसे और झूठ के अश्कों से वाकिफ करना नहीं
गम की कोई वज़ह नहीं
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अगर मैं लिखती तुम्हें,
तो शायद कुछ यूँ लिखती...
काश तुम्हारे वो वादे सच होते,
तो शायद आज तुम्हें यूँ याद न करती।
तुम्हारे वो चार दिनों का प्यार
अगर सच में प्यार होता,
तो शायद उसे बीत जाने के बाद
इतने सवाल न छोड़ता।
तुम्हारे बारे में अच्छा ही लिखती,
मगर जाते-जाते तुम्हारे कहे वो शब्द
मेरे दिल में कुछ इस तरह उतर गए
कि तुम्हारी अच्छाइयाँ भी
उनका दर्द मिटा न सकीं।
मैंने तुम्हें सिर्फ़ चाहा नहीं था,
तुम पर विश्वास भी किया था।
शायद इसी बात का अफ़सोस है
कि जिस भरोसे को मैंने अपना समझा,
तुमने उसे इतना हल्का समझ लिया।
अब सोचती हूँ,
शायद हर वादा निभाने के लिए नहीं होता,
हर प्यार हमेशा रहने के लिए नहीं होता,
और हर इंसान
हमारे विश्वास के लायक नहीं होता।
तुम जाते-जाते एक बात सिखा गए—
प्यार करो, मगर आँखें बंद करके नहीं,
भरोसा करो, मगर खुद को खोकर नहीं।
बाक़ी जो था…
उसे याद कहूँ, गलती कहूँ
या बस एक अधूरी कहानी...
पर ख़ैर,
तुमने जाते-जाते इतना तो सिखा ही दिया
कि अगली बार दिल देने से पहले
दिमाग की भी सुननी चाहिए।
#BidyaG
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तो शायद कुछ यूँ लिखती...
काश तुम्हारे वो वादे सच होते,
तो शायद आज तुम्हें यूँ याद न करती।
तुम्हारे वो चार दिनों का प्यार
अगर सच में प्यार होता,
तो शायद उसे बीत जाने के बाद
इतने सवाल न छोड़ता।
तुम्हारे बारे में अच्छा ही लिखती,
मगर जाते-जाते तुम्हारे कहे वो शब्द
मेरे दिल में कुछ इस तरह उतर गए
कि तुम्हारी अच्छाइयाँ भी
उनका दर्द मिटा न सकीं।
मैंने तुम्हें सिर्फ़ चाहा नहीं था,
तुम पर विश्वास भी किया था।
शायद इसी बात का अफ़सोस है
कि जिस भरोसे को मैंने अपना समझा,
तुमने उसे इतना हल्का समझ लिया।
अब सोचती हूँ,
शायद हर वादा निभाने के लिए नहीं होता,
हर प्यार हमेशा रहने के लिए नहीं होता,
और हर इंसान
हमारे विश्वास के लायक नहीं होता।
तुम जाते-जाते एक बात सिखा गए—
प्यार करो, मगर आँखें बंद करके नहीं,
भरोसा करो, मगर खुद को खोकर नहीं।
बाक़ी जो था…
उसे याद कहूँ, गलती कहूँ
या बस एक अधूरी कहानी...
पर ख़ैर,
तुमने जाते-जाते इतना तो सिखा ही दिया
कि अगली बार दिल देने से पहले
दिमाग की भी सुननी चाहिए।
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तुम बहुत दोगले हो,
तुम्हारी गालियों में नारी,
माँ,बहन,रंडी,कुत्तिया और साली।
तुम्हारे मुहावरों में नारी,
जनानी बुद्धि और पैरो की जूती।
तुम्हारी सोच में नारी..
चूड़ियाँ पहनना.. नामर्दागी।
तुम्हारे समाज में नारी,
डायन,कुलच्छनी,बाँझ नारी।
तुम्हारे घरों में नारी,
देवी,दासी या बेचारी।
तुम्हारे ग्रंथों में नारी,
ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी ।।
और हाँ, तुम्हारी हवस में भी नारी...
मगर इन सब से तुम्हें ऐतराज़ नहीं है।
तुम्हें ऐतराज़ है एक नारे से,
एक कचौरी, दो समोसा....
इन मर्दों का क्या भरोसा...
आख़िर क्यों?
#Bhagyashree
#review
1 oct 2026
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तुम्हारी गालियों में नारी,
माँ,बहन,रंडी,कुत्तिया और साली।
तुम्हारे मुहावरों में नारी,
जनानी बुद्धि और पैरो की जूती।
तुम्हारी सोच में नारी..
चूड़ियाँ पहनना.. नामर्दागी।
तुम्हारे समाज में नारी,
डायन,कुलच्छनी,बाँझ नारी।
तुम्हारे घरों में नारी,
देवी,दासी या बेचारी।
तुम्हारे ग्रंथों में नारी,
ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी ।।
और हाँ, तुम्हारी हवस में भी नारी...
मगर इन सब से तुम्हें ऐतराज़ नहीं है।
तुम्हें ऐतराज़ है एक नारे से,
एक कचौरी, दो समोसा....
इन मर्दों का क्या भरोसा...
आख़िर क्यों?
#Bhagyashree
#review
1 oct 2026
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कौन सी ऋतु थी?
कौन सी ऋतु थी?
जब हवा में किसीके प्यार की सुगंध थी?
किसने कितनी प्रतीक्षा की प्रेम के बहार की?
प्यार के गीतों की सरगम किसकी थी?
जब कोई आने वाला था तो ह्रदय में
किसके नाम की धून घुल जाती थी?
कौन सी ऋतु थी?
कब और कैसे दूरियों की आहट हुई?
फिर अचानक कैसे ऋतु बदल गई?
क्यों? बातें सिर्फ़ याद बनकर रह गईं?
किस की शिकायतें उस ऋतू की महक में महक रही थी?
जहाँ प्यार था,वहाँ रोने की सदा क्यों थी?
हासिल किसीको क्या हुआ प्यार को दिल्लगी कह डाली?
धूप-छाव के आईने में,
कौन सी बातें अधूरी थी?
रूठना-मनाना किसका एक तरफ़ा था?
यक़ीन किसका कितनी बार टूटा ये यक़ीनन कौन बताएगा?
अबतक क्यूँ? उसे दिल में में संभालकर कर रखा था?
प्यार की राहों के फलक से कौन मूड कर देख रहा था?
वो ऋतु
वो सुगंध
वो शिकायतों के सिलसिले
वो मुस्कान
वो रोना
वो याद
वो दिल्लगी
क्यों? कोई भूल नहीं पा रहा था?
और धीरे-धीरे रहस्य की वेदना बनते जा रहा था?
कौन सी ऋतू थी ?
जब हवा में किसीके प्यार की सुंगध थी?
#anil
#review
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कौन सी ऋतु थी?
जब हवा में किसीके प्यार की सुगंध थी?
किसने कितनी प्रतीक्षा की प्रेम के बहार की?
प्यार के गीतों की सरगम किसकी थी?
जब कोई आने वाला था तो ह्रदय में
किसके नाम की धून घुल जाती थी?
कौन सी ऋतु थी?
कब और कैसे दूरियों की आहट हुई?
फिर अचानक कैसे ऋतु बदल गई?
क्यों? बातें सिर्फ़ याद बनकर रह गईं?
किस की शिकायतें उस ऋतू की महक में महक रही थी?
जहाँ प्यार था,वहाँ रोने की सदा क्यों थी?
हासिल किसीको क्या हुआ प्यार को दिल्लगी कह डाली?
धूप-छाव के आईने में,
कौन सी बातें अधूरी थी?
रूठना-मनाना किसका एक तरफ़ा था?
यक़ीन किसका कितनी बार टूटा ये यक़ीनन कौन बताएगा?
अबतक क्यूँ? उसे दिल में में संभालकर कर रखा था?
प्यार की राहों के फलक से कौन मूड कर देख रहा था?
वो ऋतु
वो सुगंध
वो शिकायतों के सिलसिले
वो मुस्कान
वो रोना
वो याद
वो दिल्लगी
क्यों? कोई भूल नहीं पा रहा था?
और धीरे-धीरे रहस्य की वेदना बनते जा रहा था?
कौन सी ऋतू थी ?
जब हवा में किसीके प्यार की सुंगध थी?
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एक तुम...
जो मेरी सांसों में हो
एक मैं...
जो खुद में भी नहीं।।
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6 sep 2026
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जो मेरी सांसों में हो
एक मैं...
जो खुद में भी नहीं।।
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6 sep 2026
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जिस दिन मैं लिखूँगी…
भीड़ को एक भ्रम लिखूँगी,
और तन्हाई को अपना सच लिखूँगी।
दोस्ती के नाम पर मिले फ़रेब लिखूँगी,
रिश्तों के पीछे छिपे स्वार्थ लिखूँगी।
मोहब्बत को एक अधूरा ख़्वाब लिखूँगी,
और बिछड़ने को उसका अंजाम लिखूँगी।
जिन शब्दों ने मुझे तोड़ा,
उन्हें भी अपनी कहानी में जगह दूँगी,
और जिन ख़ामोशियों ने मुझे संभाला,
उन्हें अपनी सबसे खूबसूरत पंक्ति लिखूँगी।
फिर आख़िर में
न किसी को दोष दूँगी,
न किसी से हिसाब माँगूँगी…
बस अपनी कलम से
अपने सारे दर्द को अलविदा लिखूँगी,
और खुद को पहली बार,
आज़ाद लिखूँगी।
#BidyaG
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भीड़ को एक भ्रम लिखूँगी,
और तन्हाई को अपना सच लिखूँगी।
दोस्ती के नाम पर मिले फ़रेब लिखूँगी,
रिश्तों के पीछे छिपे स्वार्थ लिखूँगी।
मोहब्बत को एक अधूरा ख़्वाब लिखूँगी,
और बिछड़ने को उसका अंजाम लिखूँगी।
जिन शब्दों ने मुझे तोड़ा,
उन्हें भी अपनी कहानी में जगह दूँगी,
और जिन ख़ामोशियों ने मुझे संभाला,
उन्हें अपनी सबसे खूबसूरत पंक्ति लिखूँगी।
फिर आख़िर में
न किसी को दोष दूँगी,
न किसी से हिसाब माँगूँगी…
बस अपनी कलम से
अपने सारे दर्द को अलविदा लिखूँगी,
और खुद को पहली बार,
आज़ाद लिखूँगी।
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